गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

नव वर्ष २०१० की शुभकामना

* आप सब को नवल वर्ष २०१० की हार्दिक शुभकामनाएं *


मुस्कान सभी अधरों पर छाये,
समग्र विश्व एक सुर में गाये ,
दीप ख़ुशी के जग में हों रोशन
नव वर्ष, सम्पूर्ण नवलता ले आये |

तम के गलियारे सारे जग के
जगमग हों अब शुभ्र ज्योति से
कोपलें सुमति की फूटें हरसू
धरा ज्ञान से जगमग हो जाये |

दूर क्षितिज से किरणे जो फूटें
नवल जोश का सबमें संचार करें,
हर एक आँगन में महकें खुशियाँ
'श्वेत' शान्ति का परचम लहराये |

जो गया, हो गया, उसे भूल कर
आँखें मसल, इस नव भोर में अब,
नव स्वप्न, निज पलकों में भर
सफलता के उत्कर्ष को सब पायें |

मिटें ये दूरियां, सबके दिलों की
भेद भी कोई हमारे अब न रह पायें ,
सीमायें हों दफ़न सारी अपनी जगह
वसुधा अब कुटुम्ब एक हो जाये |

परिंदों सी ऊँची, सब उड़ाने लगायें
अहम् से जुदा, सबको अपना बनायें,
मेरी कामना है इस नव वर्ष में सब
द्वेष को भूल, प्रेम की बगिया सजाएँ |

नव वर्ष की जो पहली सुबह आये
उषा की उज्जवल किरण, सबको जगाये,
सुखी हों , स्वस्थ हों , खिलें ख़ुशी से,
तन मन में सबके नव उमंगें भर जाये |



-------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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रविवार, 6 दिसंबर 2009

कब तक मेरा साथ दोगी ?

समय के भंवर को ,कठिन हर लहर को
तुम्हारे ही दम पे तरा हूँ , जिया हूँ,
लड़ा हूँ समय से ! जब चल पड़ा हूँ
हर पथ पे मेरे पथ की प्रदर्शक !

जीवन की गति की अनूठी है भाषा,
मन की तरंगों से अपनी उमंगों को,
मैंने छुआ है तुम्हारे ही दम से ,
सुप्त मन में तुम दीप्त हर पल !

स्वच्छंद हो कर विचरा कहीं भी ,
सहारे की लाठी तुम ही बनी हो ,
गिर कर उठा हूँ तुम्हारी बदौलत,
नव लय में मेरी हमेशा सहायक !

आशाओ मेरी !
कब तक मेरा साथ दोगी ?

------------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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बंद आँखें....

खुली आँखों से तो
दिखता है सब !
पर इन दिनों
बंद आँखों से
देख लेता हूँ
कहीं ज्यादा |

खुली आँखें !
दिखाती हैं सच |
और बंद आँखें ?
दिखा देती हैं
उस सच के भी भीतर,
शायद अपना सच |

सुना था बंद आँखें
देखती हैं स्वप्न ,
अवास्तविक और भंगुर !
लेकिन...
मेरी दुनिया है
बंद आँखों के भीतर
और सच्ची दुनिया !!
जहाँ मैं, मैं होता हूँ
सारे चोगे उतारकर
मैं !

ऑंखें खोल कर
देख पाया बस
मुट्ठी भर दुनिया,
मुट्ठी भर लोग,
और न जाने
कितने चेहरे, अपने ही |
किन्तु
मैं परखता हूँ
स्वयं को ,
इन बंद आँखों में |
मैं सजाता हूँ
अपरिमित संसार
हाँ , अपरिमित और अनंत !!

निरंतर बदलता
मेरा संसार ,
कोई छल नहीं !
कोई भ्रम नहीं !
मेरे लिए
मेरे जीवन का सच,
बंद आँखों के भीतर
मेरे स्वप्न , मेरी दुनिया !
मेरी खुशियाँ !
हाँ !
मेरा सच !


---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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सोमवार, 23 नवंबर 2009

मेरा "मैं" !!!

सवालों से मेरा रिश्ता
थोडा गहरा है शायद
आज उलझ रहा था
फिर खुद से ही
पनपने लगा फिर एक सवाल

मैं दो हूँ क्या....
हाँ !
मैं एक नहीं, दो हूँ
और दोनों पूरा दिन
लड़ते रहते हैं बस !

अगर मैं कहूँ ऐसा
तो दूसरा कहे वैसा
कोई निश्चय हो
टांग अड़ा देता
खुद मैं ही, दूसरा वाला !

अगर ऐसा होता
दोनों दोस्त हो जाते
लेकिन नहीं !
इतनी उम्र बीत गई
नहीं हुए और शायद
हों भी ना कभी !

अगर ये एक होते
मैं, मैं नहीं होता
मैं यहाँ नहीं होता
मैं ऐसा नहीं होता
मैं क्या होता फिर ?
कैसा होता ?

शायद मैं वो करता
जो चाहता था
मैंने वही कहा होता
जो सोचा था सबसे पहले |
क्यों मजबूर होता हूँ
दूसरे मैं की खातिर ?
क्यों एक मैं, दबा देता है
दूसरे को
हमेशा !

बस !
लगा हूँ आज भी
मेल हो जाये बस !
फिर मैं करूँ , जो मैं चाहूँ!
मैं वो बनूँ , जो मैं चाहूँ !
मैं वो कहूँ , जो मैं चाहूँ !
कौन है ना जाने
मेरा दूसरा मैं ?
या
"मैं" ?

-----------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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शनिवार, 21 नवंबर 2009

अर्थ जीवन का !!!

फिर आ गया हूँ
प्रश्न लेकर अपना पुराना
गतिमान मैं भी ,
जीवन भी मेरा
नए पथ , नूतन बसेरा |
प्रश्न मेरा आज भी है
किस तरफ पग चल पड़े हैं
क्या है अब इसका किनारा ?

मूंदता हूँ नेत्र अपने
खोलता जब पट घनेरे
दंभ भरता हूँ यकायक
मोह में किसके बंधा मैं ?
जान पड़ता अगले ही क्षण
नश्वर ये अभिलाषा है मेरी
क्षणिक बस ये रंग सुनहरे |

फिर नए पदचाप सुन
नए पथ के भ्रम में रत
नयी लय को झट पकड़
पग बढ़ाता एक
और फिर बस !
चल ही पड़ता अनवरत
किस दिशा में, कौन जाने?
छद्म के कोहरे में लेकिन
बूझता तब कोई मुझसे
पूछता या मैं स्वयं से
क्या लक्ष्य का संज्ञान मुझको ?
किस पथ का मैं पथिक |

इन तरंगों का अर्थ क्या
स्वार्थ इनमें लिप्त किसका
मुझमें जो उठती कभी हैं
फिर स्वयं बुझती सभी हैं ?

जीवन ये मेरा पथ अगर
क्या है इसका सच मगर
क्या लक्ष्य इसका 'अर्थ' है ?
इस कामना का अंत कब है ?

जड़ हुए हैं अब ये पग
विराम है, अब है चिंतन |
खोजनी है अब मुझे
परिभाषा अपनी !!
जानना है अब मुझे
अर्थ ,
जीवन का मेरे !!


----------------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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मंगलवार, 29 सितंबर 2009

मैं 'घुमन्तू '

बहुत दिन हो गए | कई दिनों से जरा घूमने के शौक में व्यस्त हूँ | पता नहीं क्यों आजकल घर पे नहीं टिक पाता | एक अलग एहसास है घूमने में भी |
आज फिर से कविता लिखने की कोशिश की तो वही कुछ लिख पड़ा |

गुम हूँ कहीं
लेकिन,
खोया नहीं हूँ
खोज ही रहा हूँ अब तक
आजमा रहा हूँ तरीका नया |

इन दिनों देखता हूँ
हर जगह से उगता सूरज ,
महसूस करना चाहता हूँ
हर ख़ुशी को उसकी |

हर डूबते सूरज से,
मिल पड़ता है
राह में जो,
पूछता हूँ उसके अनुभव |
सोचता हूँ कुछ,
थोडा समझता हूँ
फिर खोजता हूँ |

हर पानी से पूछता हूँ
राज़ क्या है
निरंतरता का उसकी,
नयी-नयी हवाएं ,
कह जाती हैं कुछ
कान में धीमे से
फुसफुसाकर|
कभी उलझा जाती हैं,
कुछ सुलझ भी पड़ता है कभी,

समय एक चक्र है
और जीवन भी,
सब घूमता है|
पहले अकेला बैठ
घुमाता था दिमाग को,
सोचता था कुछ ,
खोजता था |

पर
इन दिनों
घूमता हूँ
चक्के की तरह,
लेकिन,
चक्के सा बेजान नहीं |

जैसे लग गए पहिये मुझ में,
बस नापना चाहते हैं,
दूरियां सारी |
लेकिन अब भी खोजता हूँ,
देखता हूँ बहुत कुछ
समझता हूँ नया
न जाने क्या कुछ |
इन दिनों
बन गया हूँ
मैं 'घुमन्तू'|

----------------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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शनिवार, 15 अगस्त 2009

पांडे बैठे कविता लिखने.....

थोडा हास्य लिखने का प्रयास किया | खुद पे ही लिखी है कविता | कुछ मित्रों ने मुझसे ऐसा बोला तो वही लिख पड़ा .....

पांडे बैठे कविता लिखने
बड़ी बड़ी कर देते बातें
कोई समझे, कोई न समझे
सबसे वाह वाह मांगत फिरते |

यार दोस्त सब कहने लागे
अब तो पांडे गयो पगलाय,
भरी जवानी, बम्बई में रह कर
कैसी कविता रहत सुनाय |

सारी दुनिया बांच दी तुमने
क्या क्या दियो अब सुनाय,
पांडे बस! कर बंद मुह अपना
कुछ प्यार पे न लिख्या जाय ?

पांडे भइया उलझे थोडा, सोचे
अब तो कुछ सोचा जाय ,
कोशिश करे , थोडा जोर लगाये
चलो दिलवा तक पहुंचा जाय|

पहुंचे गहरे दिल के अन्दर
सोचे, है का भीतर देखा जाय,
कुरेद कुरेद रहे अब दिल को,
रत्ती भर प्यार, सारा रहा मिमियाय !

आखिर में वो खुद से ही बोले
प्रेम न होवे , ना लिख्या ही जाय,
भइया मानो, पत्थर है दिलवा में अपने
कोई कोना रोमांटिक ना होय !

कोई कोना रोमांटिक ना होय
की भइया तबही हुए "अपूर्ण"
अनजाने में नाम धर लिए
सोचे आज जो समझे, एकदम सच्चा होय |


----------------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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भारत तुझे फिर नमन करना चाहता हूँ !

सौभाग्य मेरा, जन्मा यहाँ पर
खुशियों का सब तोहफा मिला
हर कदम अपने मन से
तेरे साये में जी रहा,
ऐ महान देश मेरे ,
भारत तुझे फिर नमन करना चाहता हूँ !

सांसों में गर्व है हर पल
तेरी ही वजह से
लहू में स्वाभिमान भी
बस तेरी वजह से
आजाद हूँ मैं,
उड़ रहा अपने परों पे
तेरी बदौलत !
तुझसे ही मैं हूँ हमेशा
दिल में धड़कता तू ही मेरे ,
ऐ महान देश मेरे ,
भारत तुझे फिर नमन करना चाहता हूँ !

--------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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तिरंगा कह रहा है ...

स्वतन्त्रता दिवस की वर्षगाँठ पर हार्दिक शुभकामनाएं.....:)


लहरा रहा है मदमस्त हो कर
पर नम इसका कोई कोना है,
देख हमको, तिरंगा कह रहा
कोई इसकी, अधूरी कामना है

गुलामी के चंगुल से मुक्त हुआ
कुर्बानी दे कर इसको छीना है
पर जो दिखाए थे इसको सपने
उनको अभी साकार होना है

आज भी है दर्द बाकी कहीं तो ,
फिर दिलों को संग सीना है
तिरंगे पर गर्व तो है सबको
पर इसे आसमां अभी छूना है

हर ललाट में तेज केसरिया,
श्वेत सुकून हर घर में होना है
हरी हरीतिमा हिय-आँगन में
गतिमान चक्र सा होना है

ऋचाए आज गाना चाहती हैं
आयतों का सुर ताल होना है
गुरुवाणी के पाठों, गिरजों का
संग एक बड़ा परिवार होना है

साँसों में, गर्मी की है जरुरत
कुछ लहू फिर कुर्बान होना है
वतन हमसे फिर कुछ मांगता है
ह्रदय में अब नव ज्वार होना है

अपने उन्मुक्त तिरंगे के साये में
मिलजुल कर सबको जीना है
आजाद हुए हम बरसों पहले
पर अभी नया सवेरा होना है


--------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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मंगलवार, 11 अगस्त 2009

मैं चुप हूँ..

मैं चुप हूँ
बोलता था बहुत ,
कभी कभी तो
बहुत से भी थोडा ज्यादा,
लेकिन अब मैं चुप हूँ |

जब बोलता था
तो सब कुछ बोल देता था,
अब चुप हूँ
तो बस टटोलता हूँ,
टटोलता हूँ
कुछ खुद में ,
कुछ दूसरों में |

ज्यादा बोलना ही चुप कर गया एक दिन
महफिलों कि शान था कभी
और
लोगों कि हंसी की वजह भी कभी कभी

लेकिन अब टटोलता हूँ
मेरी हंसी
जो खुश कर दे मुझे भी ,
कभी खुद में, कभी दूसरे में
शायद कोई तो वापस कर दे
जो हंसी
मैंने दी थी उसको कभी .....

-------------------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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रविवार, 9 अगस्त 2009

किस ओर ?

कायर खुद को झकझोर कहूँ
या विधि के विधान का जोर कहूँ?
हिला स्वयं के अंतर्मन को
श्वेत वस्त्र में लिपटा चोर कहूँ ?

चाहत को इस कह दूँ लोलुपता
और स्वयं को लोभी, अधीर कहूँ?
या मानव मन की आदत समझूँ
और ब्रह्म सृष्टी की रीत कहूँ ?

पल पल भटके मन जो मेरा
पागल समझूँ, इसको नादान कहूँ?
समझाऊं बैठ इसे हर पग पर
या बहने दूँ, उन्मुक्त समीर कहूँ?

इच्छा,अभिलाषा,सुख,आनंद
इन सबको कैसे मैं एक कहूँ ?
जूझ रहा हूँ इन सब से हर पल
किसको जीवन का लक्ष्य कहूँ ?

किस राह पकड़ कर है चलना
जिसको मैं फिर नव भोर कहूँ?
रह रह कर खुद में प्रश्न उमड़ते
मन को, चल किस ओर कहूँ ?


---------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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शनिवार, 8 अगस्त 2009

ख्याल...

बहुत दिनों बाद
फिर से जी चाहा कुछ लिखूं,
जंग खा गए लगते हैं
दिल-ओ-दिमाग के पुर्जे,
सूझ रहा है बहुत कुछ लेकिन
कुछ रुकता ही नहीं !
मक्खियों सी भिन-भिन है बस,
कुछ सुन नहीं पा रहा कि कौन
क्या कहना चाहता है आखिर!

अजीब सी हलचल है रूकती ही नहीं
बस हुए जाती है, हुए जाती है
फिर से जाल डालता हूँ एक
कम से कम छान ही लूं
बड़ी मक्खियाँ और छोटी अलग अलग
फिर मुश्किल शायद कुछ कम हो

ख्याल भी कैसे कैसे होते हैं
बड़े छोटे लम्बे पतले मोटे नाटे
कुछ काम के और कुछ एकदम बेकार !


------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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मंगलवार, 21 जुलाई 2009

आखिरी अलविदा.....

कुछ देर, इक दिन या इक हफ्ता
बस !
यही कह कर गए थे न तुम ?
और ये उम्मीद जगी रह गई
वापसी की.......

शायद मुसलसल मिलती रही माफियाँ
बेफिक्र कर गई मुझको
खौफ ही न रहा, कि कोई
लकीर भी है हमारे दरमियाँ

शायद मैं ही न समझ पाया था
या दोस्ती
या फिर लकीरें
या फिर
भरोसा हो गया था
या तो खुद पर
या आप से जयादा तुम पर
पता नहीं किस पर !

काले बादलों के बीच निकल पड़ता है
चाँद जब, चमचमाते खंजर की तरह,
तुमने भी, कम से कम
इक हाथ निकाल के कह दिया होता
अलविदा !
हाँ !
आखिरी अलविदा ही सही
और काट दिया होता गला इन उम्मीदों का
उस खंजर से,
कि
अब झूठी उमीदों के साथ नहीं जिया जाता मुझसे !!



------------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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गुरुवार, 16 जुलाई 2009

आशियाँ दरख्तों पर बसाने चले हैं....

आशियाँ दरख्तों पर बसाने चले हैं
गुल कोई नया अब खिलाने चले हैं|

कभी कोई आये खयालो में जैसा
फिर समां आज वैसा बनाने चले हैं|

खुदा से ही पूछो कहाँ जायेंगे अब
खुद तो न जाने किस ठिकाने चले हैं|

सबर अब न है ना ही कोई उम्मीदें
आज खुद को ही हम आजमाने चले हैं|

सोचेंगे ना अब अंजाम-ए-सफ़र की
राह में मंजिलों को सजाने चले हैं |

भागते थे जो "निपुण" आप ही से
गीत दिल के वो अब गुनगुनाने चले हैं|

----------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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मंगलवार, 14 जुलाई 2009

मैं अपूर्ण......

बहुत दिनों से ये रिश्ता कुछ ऐसा बन गया है की बस अब कभी भी तुम कुछ न बोलो तो लगता है जैसे कुछ अधूरा सा रह गया |
सोचा आज तुम पर ही कुछ लिखूं या फिर तुम चली आई अपने आप कुछ बन कर ......

बादल उमड़ते हैं,
तुम आती हो
बादल बरसते हैं,
तुम आती हो
हवा की छुन-मुन
या
तूफ़ान की सरसराहट
तुम आ ही जाती हो,

तन्हाई के भीगे पलों में,
रुसवाई के क्षणों में,
याद कोई आये
या मिल जाये,
विरह की वेदना
या मिलन का उन्माद,
सच !
तुम्हें नहीं मतलब इन सब से,
तुम ही हो
सच्ची हमसफ़र शायद,
जो कुछ नहीं मांगती मुझसे
हाँ कभी भी नहीं
बस आ जाती हो,

दिल के भीतर कहीं
छुपी सी रहती हो
हमेशा,
बस कुछ भी हो
आ जाती हो
इठलाती हुई,

कोई भय भी नहीं
तुमको
लोगो का ,
दुनिया का ,
कोई क्या कहेगा?
उँगलियाँ उठेंगी तुम पर?
या महफिले सजेंगी,
तुम ऐसी हो या वैसी हो,

अब शायद
कोई फर्क नहीं पड़ता
मुझे भी
की तुम कैसी हो,
क्या नाम दूं तुमको?
क्या परिभाषा दूं ?
जैसी भी हो
तुम मेरी ही हो
हाँ
तुम मेरी कविता हो |

कभी सोचता हूँ
मैं नहीं लिखता तुमको,
तुम लिख देती हो
मुझे,
मेरे मन को,
इन हलचलों को
आकार देती हो,
वर्ना भटकती फिरती
जो कहीं,
शायद तुम मेरी हो
मैं तुम्हारा
और तुम्हारे बिन
मैं अपूर्ण |

--------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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ज़िन्दगी का सफ़र...

लम्बा तो बहुत ये ज़िन्दगी का सफ़र है
धूप है, छाँव है, ख़ुशी भी हर डगर है|

बैठ के दो पल जो करें इसका सामना
मुस्कुरा के देख यहाँ रंगीन हर सफ़र है|

मौसम हैं कई इस दुनिया में खुदा की
हर हाल में जीना है तू इंसान अगर है |

साकी मेरे पैमाने में कुछ रंग तो भर दे
मैखाना-ए-दिल में जो थोड़ी सी कसर है |

ग़म रोज़ हर एक मोड़ पे मिलते ही रहेंगे
उनमें भी ख़ुशी खोज जो जज्बा-ए-जिग़र है|

क्यों तेरी निगाहों में "निपुण" अश्क़ दफ़न हैं
हंस बोल जरा जिन्द तेरी नूर-ए-नज़र है|


--------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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तरकीब...

कोई तरकीब सोचता हूँ
सूझती ही नहीं
ताने बाने में इस
फिर निकल पड़ता हूँ जब
खोजने खुद को,

शौक है शायद मेरा,
अक्सर उग पड़ता है दिल में
वर्षा में उगने वाली
हरी घास की तरह,
फिर सूख जाता है ,

एक दिन फिर
उग पड़ता है
अनायास ही बिलकुल
जब कभी कोई एक डोर
आ जाती है पकड़ में,

उस डोर को पकड़
भिड़ाने लगता हूँ जुगत
दुसरे छोर तक जाने की,
लेकिन ये मकड़जाल
उलझता ही चला जाता है,
और फिर
फंस जाता हूँ कहीं
फिर सो जाता हूँ कुछ दिन,

शायद इस जाल को
कहते हैं जिंदगी,
और मैं नादान
सुलझाने लगता हूँ इसको,
फिर उलझता हूँ
और फिर उलझता हूँ
और ज्यादा उलझता हूँ
उलझता ही रहता हूँ
और
जीता रहता हूँ ज़िन्दगी ....


------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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रविवार, 5 जुलाई 2009

साँस लेते बुत..

इंसान सब जाने कहाँ खोते गए
साँस लेते बुत से सब बनते गए

ज़िन्दगी के इस सफ़र में मुक्तसर
खोजते थे कुछ, औ' खुद खोते गए |

घर हुआ करते थे वो एक वक़्त था
महल की ख्वाहिश में सब ढहते गए |

घनी आबादियाँ वीरां होती रही
पत्थरो के मकां बस बनते गए |

शहर को किसकी नज़र ये लग गई
बंज़र, हंसीं मंजर सारे होते गए |

था हुजूम-ए-दिलकशी हर चौक पर
अब बेजाँ खिलौने राह में मिलते गए |

हर शब् जो होती थी दिलो में रौनकें
तन्हा ख़लिश उनमें बस भरते गए |

महसूस करते थे "निपुण" अकेले तुम नहीं
सोचते थे सब यहाँ, मगर बहते गए|



---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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शनिवार, 4 जुलाई 2009

कानून में सुधार आया है**

चाहे मानसून लेट आया है
पर एहसास नया ये लाया है,
कानून में सुधार आया है
देश में अब बदलाव आया है|

लड़के को लड़की न खोजनी
ना लड़की को लड़का,
कोई भी मिल जाये चलेगा
बस भिडे प्रेम का टांका |

शायद अब किसी घर में
मूंछों वाली भाभी आएँगी,
कन्यायें कन्या को भी अब
जीजू जीजू बुलाएंगी|

उन्मुक्त गगन के नीचे केवल
अब जोड़े ना रास रचाएंगे,
बदला बदला होगा मंजर
लड़के जब लड़का पटायेंगे|

पुलिस के पास भी अब शायद
छेड़छाड़ के केसेज बढ़ जायेंगे ,
महिला महिला को छेड़ेगी
पुरुष पुरुष से छेड़े जायेंगे |

हर सिक्के के पहलू दो होते
कुछ सुधार तो आयेंगे,
ये नए बदलाव देश को
जनसँख्या विस्फोट से बचायेंगे|


------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

** यह कविता कोई गंभीर विचारधारा को प्रकट नहीं करती | कुछ पहलुओ को हास्य रस में प्रस्तुत किया गया है |

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मिथ्या....

जग जग घूमा नगरी नगरी
माया की ये दुनिया पूरी,
आखिर में मैं खुद से बोला
चल वापस ये शाम घनेरी|

मन तो निश्चल पावन था ये
ना समझा था कुछ कुटिलाई,
मनभावन जो इसे लगा था
उस पथ की थी आस जगाई |

पल पल महकी खुशबू आई
दूर मरीचिका जब इठलाई,
देख उसे तब चंचल मन में
लोलुपता ने ली अंगडाई |

देखा इसने कोनो कोना
सब लगता था कंचन सोना,
पास गया जब तो ये पाया
ठूंठ था सब, था मिथ्या रोना|

रे मन ! अब तू सोच समझ ले
दिखे जो पथ ये सुगढ़ सरल सा,
मुश्किल होगा पार पहुँच के
मिलना, देखा स्वप्न था जिसका ||



------------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

समझ..बौनी हो गई है

अक्सर कुछ ऐसा होता है कि कुछ लिख रहा होता हूँ और मन भटकता हुआ कहीं और चला जाता है और अंत में कुछ और ही बन पड़ता है .... इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ ....

आज
समय के चक्र में
घूमता हुआ
आ चुका हूँ दूर
पर
अब चाहता हूँ लौटना |

लौटना चाहता हूँ ,
फिर से जीना चाहता हूँ ,
वो बचपन
जो छोड़ आया हूँ
कोसों दूर
वो यादें फिर से एक पल
पहुंचा देती हैं वहीँ |

वो ताम्र कलश के
जल सा निर्मल मन,
वो उगते सूर्य की
किरणों सा चंचल हृदय,
सब अपना मान लेता
वो निर्भय मन ,
वो अनूठी अभिलाषा
चाँद को छूने की,
और वो साहस कुछ भी
कर जाने का |

सोचता हूँ
वो निर्भयता थी
या विवेकहीनता
कोई भी ऊँगली पकड़
चल पड़ने का साहस
मुझमें अब तो नहीं ,

समझ बढ़ गई
राग भी बढा,
बैर भी बढा,
और साथ में बढ़ गया
अपने पराये का बोध,
अपना बनाने से कही ज्यादा
बढ़ गया
पराया करने का साहस |

मन , अब भी
अपराधबोध मैं है ,
फिर भी
क्यों नहीं निकल पड़ता
बाहर इस सब से?
क्यों पग पग होते
डगमग ?
कौन सा भय रोक देता है?
कई प्रश्नों का
उत्तर खोज रहा हूँ
शायद
समझ बढ़ी नहीं
बौनी हो गई है |

------------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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गुरुवार, 2 जुलाई 2009

पागल ये मन

पगला ये मन
भटकता ही फिरे
जाने क्या आस है
कोई तो प्यास है
कुछ तलाश है
खोजता ही रहे
चाहे क्या ये पागलSSSSS
पगला ये मन .............

बैठा रहे कहीं
खोया सा गुम कहीं
जाने कुछ भी नहीं
चैन पल भर नहीं
भटके भटके पागलSSSSS
पगला ये मन ..........

चाहे इसको कभी
चाहे उसको कभी
पलके देखे कभी
खवाब झिलमिल सभी
बांवरा होने लगेSSSSS
पगला ये मन ..................

गुनगुन करता रहे
खुद से कहता रहे
देखे खुद को कभी
पूछे खुद से कभी
ताके धरती अम्बरSSSSS
पगला ये मन ..................

दूर कुछ तो दिखे
धुंधला सा वो लगे
मन्ज़िल उसको कहे
रास्ता पर ना दिखे
घूमे नगरी नगरीSSSSS
पगला ये मन
भटकता ही फिरे.................
पगला ये मन .................

------------------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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बुधवार, 24 जून 2009

पहली वर्षा............

पवन एक मदमस्त आई
मेघ को तब याद आई
गगन का अभिमान टूटा
धरा को वरदान जैसा

प्यासी पड़ी कुम्हला गई थी
व्याकुल जमीं ऐसी हुई थी
जब मेघ गर्ज़न कर उठे
फिर विटप पादप खिल उठे

धरा कुछ यूँ मुस्कुराई
अमृतमयी जब फुहार आई
घनन घन घन मेघ गरजे
झिमिर झिम झिम फिर जो बरसे

कुछ इस तरह से जब हुआ
वर्षा का पहला आगमन
वो था बरसता ही गया
मन ये बहकता ही गया

टिप टिप थी हर सू हो रही
हर ओर बूंदे झर रही
नृत्य करता सा मगन था
तृप्त अब हर इक नयन था

मस्त सी जब रुत ये आई
हिय की कली फ़िर खिलखिलाई
मन बाँवरा सा हो रहा
अब झूमता ही जा रहा |

----------------------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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मंगलवार, 23 जून 2009

मुझको ले चल उड़ा..........

आज सुबह तकरीबन ३ बजे खिड़की पे बैठा हुआ था ......भीनी भीनी सी हवा बह रही थी ...कुछ झकझोर गई मन को और बहुत दिनों बाद कुछ पंक्तियाँ बन गई ......



सोंधी सोंधी हवा,
भीनी भीनी हवा,
प्यारी प्यारी सी हौले सुनो
सरगम गाती हवा,

मुझको छूती चले
रेशमी सी लगे
तार मन के हिले
कुछ कहे कुछ सुने
मनचली सी हवा
भीनी भीनी हवा

अम्बर में छाए जब
मेघा काले निराले मेघा ,
यूँ तू बहने लगी
कुछ तू कहने लगी ,
आस मन में मेरे
फिर से जगने लगी ,
और अब ना सता
मुझ को ले चल उड़ा ,
चुलबुली सी हवा
भीनी भीनी हवा ,

नभ में देखो जरा
चाँद है छुप रहा
तारे दिखते नहीं
मेघा बहके से हैं
परदा सब पे किए,
बहकी तू भी लगे
क्या तू गाती चले
गीली गीली हवा
भीनी भीनी हवा

ऐसा भीगा सा
मौसम है आया
राग मन में
उमंगो का छाया
चाहता हूँ उड़ूं ,
मैं भी बहता फिरूं
साथ ले चल मुझे
अपने संग ऐ हवा

बारिशों को लिए
उड़ती आई चली
भीगे तन मन मेरा
बांवरा बन चला,
ख्वाब सोये हुए
अब हैं जगने लगे ,
अरमा दिल के मेरे
क्यों मचलने लगे ,

महका सा है समां
गाती है हर फ़िज़ा
अब सबर न रहा
मुझको ले चल हवा,
भीनी भीनी हवा
गुनगुनाती हवा
मुझको ले चल उड़ा |

--------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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सोमवार, 18 मई 2009

खामोश आवाज़.....

दिन भर, रात भर
सुबह से शाम
खेलता हुआ
गोद में
उछ्लते कूदते
असंख्य विचारों की

पाता हूँ कभी
खिलखिलाता हुआ
खुद को
और कभी
गुमशुदा
खुद को, खुद से

फिर गूंजती है
एक खामोश
बहुत खामोश सी आवाज़
और
वापस लौट पड़ता हूँ
उसी की और
न जाने
कहाँ से
कहाँ को
कहाँ तक.....

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रविवार, 3 मई 2009

ख्वाहिशें

१ . सुनती हैं ,बोलती हैं ,हंसती हैं ,रोती हैं
बेखौफ,बियाबां में,बस भटकती रहती हैं

खाव्हिशें क्यों इतनी अजीब होती हैं ?


२. लोग ख्वाहिशों पे क्यों लगाम नहीं बाँधते
हमेशा से इनकी उडाने लम्बी हुआ करती हैं

चाँद के बाद सूरज पे पहुँच, झुलस पड़ती हैं|

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शनिवार, 2 मई 2009

अफ़साने

१. ज़िन्दगी में ख़ुशी खोजते हैं सभी
कुछ आती हैं , कुछ आकर जाती भी

अफ़साने इसी तरह बना करते हैं |



२. कारवां चला करते हैं वक़्त के संग-संग
बहक पड़ते हैं कुछ पल ले के नए रंग

बहके रंग, पलों को अफसाना बना देते हैं |




३. भीड़ में मिलते हैं, गुजरते हैं हज़ार चेहरे
एक पल को थम जाते हैं कदम जो कहीं

अफ़साने वहीँ कुछ बन जाया करते हैं |

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कुछ लम्हे

वक़्त कट जाता है
उम्र गुज़र जाती है
लम्हे कुछ मगर
लम्हे ही रह जाते हैं,

अँधेरी रात में
भटकते जुगनू,
करीब जाओ
सिमट से जाते हैं,

जाने क्या है
तिलिस्म सा कुछ,
जो लगे अपने
बिखर से जाते हैं|

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शनिवार, 25 अप्रैल 2009

जीवन क्या है...

ग़ज़ल लिखने के मेरे प्रयास का दूसरा कदम....



जीवन क्या है एक ना एक दिन जानना पड़ता है
खोने पाने का हर मौसम सबको काटना पड़ता है |

सुन्दर सुर्ख नहीं हो जाते यूँ ही सारे गुलाब
कोपल छोड़ उन्हें कांटो में खिलना पड़ता है |

वक़्त के दरिया में से बहकर निकले जो
खुशियों और दुखो को उन, अपनाना पड़ता है |

जीवन के इन खेलों में, जीतना चाहे मुमकिन हो,
खुश होकर कुछ मौको पर हार भी जाना पड़ता है |

वक़्त हमें सिखला देता है जीने के सारे अंदाज़
बस सीखों को अपना बना कर गले लगाना पड़ता है |

गर्दिश-ए-दौराँ हर मोड़ पे मिलते हैं "निपुण"
जज्बा-ए-दिल हो गर तो उनको जाना पड़ता है |


-------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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भोर से पहले

आज सुबह तकरीबन चार बजे ही आँख खुल गई | सोचा कुछ लिखूं तो ये कुछ पंक्तियाँ बन पड़ी .......

जग गया हूँ आज मैं सुहानी भोर से पहले
सोचता हूँ इस ख़ुशी में कुछ लिखूं ,
पर भटकता हूँ विचारो की धुन्ध में
बूझता हूँ आप से, लिखूं तो क्या लिखूं ?

पंछियों के प्रात के इस गान को
मधुर कलरव समझ कर मैं लिखूं ?
या निशा के दूर तक फैले हुए
निःशब्द सन्नाटे को लिखूं ?

भानु की चंचल किरण जो अभी आई नहीं
तेज को उसके, नव जोश को लिखूं ?
या गगन में दूर तक पसरे हुए
तिमिर घोर के आक्रोश को मैं लिखूं ?

सोचते ही सोचते नभ लालिमा में रंग गया
रात का अँधा कुआँ चुपचाप जा के सो गया ,
क्षितिज से है झांकती उज्जवल उषा
सोचता हूँ अब इस उजाले पर लिखूं |

इस सुबह मैं कुछ नया ना सोच पाया
पर वही सच बचपन से सुना फिर याद आया,
सब्र रख, बीतेगी निशा और सुबह होगी
चाहता हूँ भोर के उन्माद को अब मैं लिखूं |

----------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

अरमां मेरे ................

आज एक ग़ज़ल लिखने की कोशिश की ......ग़ज़ल के तकनीकी कानून से तो बहुत दूर भटक ही गया हूँगा ...फिर भी कुछ कुछ तुकबंदी सी हो गई है.................

इन दिनों कुछ इस तरह चले जाते हैं,
झूमते गाते ही सब हमें नज़र आते हैं|

राह में चलते हुए शब्-ओ-रोज़ मगर,
अजनबी खुद को, खुद से ही पाते हैं|

खोजते रहते हैं कूचों में कुछ न कुछ,
मीनारें उँगलियों से बनाना चाहते हैं |

तन्हाइयों में गुम, भटकते हैं इस तरह,
नुक्कडों पर मैकदे बस नज़र आते हैं |

रास्ते मिलते हैं चौराहों पे खुद-ब-खुद,
मंजिलों के निशाँ मगर सिमट से जाते हैं|

मंजिलों से आते हैं ख़ामोश हवा के जब झोंके,
"निपुण" अरमां तेरे, फिर मचल से जाते हैं |



-------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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नयी सुबह....

नयी सुबह
किरणों में ओज
अनोखा ,
पलकों में दस्तक
नए नवेले ख्वाबो की,
कदम
लबालब जोश से
दौड़ जाने को बेताब,
पिंजडे से छूटा पंछी
निकल पड़ा हो जैसे
छू लेने बादलो को |

आशाये,
बसंती कोपलों जैसी
लिपटी हुई
नए चोगे में,
थिरक रही हैं
उंगली ले हाथो में
इन ख्वाबो की

मन ये पागल
खडा किनारे
देख रहा है ,
कर बैठेगा
कुछ अगले ही पल ,

बरसों से था
इंतजार में
इसी सुबह के,
शायद पा ले
अब कुछ
अगले ही पल
नई सुबह में ....

-------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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बुधवार, 22 अप्रैल 2009

उलझन

आज फिर वही
वही अनसुलझे सवाल
वो पहेलियाँ सी उड़ती हुई
पतंगों की तरह,

जेहन को फिर एक बार
कर देंगी तार तार
फिर होगा वही
शायद वही कुछ

मस्तिष्क जूझता हुआ
अपने तंत्र में
खोजता सा कुछ
भटकता रह जाएगा|

---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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जिंदगी...

जिंदगी... मैं हूँ ज़िन्दगी
जी ले तू जी ले मुझे थाम कर
कह दे मुझे तू कभी मुख्तसर
पर है ये लम्बा मेरा सफ़र

चाहा जो तूने मुझे
दो पल कभी जान कर
ग़म भी समेटे खड़ी मैं
खुशियो का डेरा भी मेरा सफ़र

रंग अपने हर पल बदलना
मेरी है फ़ितरत मगर ,
सतरंगी बनूँ, झिलमिलाती फिरूं
ख्वाहिश तू कर ले अगर

जब देखूं तारे, नज़ारे
छुपाये से चिलमन तले
गाने लगूं गुनगुनाने लगूं
पास आने को तेरे मचलने लगूं

ख्वाब देखे हैं तूने कई
कोशिश तो कर, कभी पा सकूँ
तेरे दिल को मिले फिर सुकूँ
भूलूं मैं ग़म, मुस्कुराने लगूं

ज़िन्दगी हूँ मैं कुछ इस तरह
पल पल की मैं हूँ रखती खबर
खुशियों को अपनी बस याद रख
ग़म को भुला, कर दे बेअसर

---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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सोमवार, 26 जनवरी 2009

फ़िर आया गणतंत्र दिवस ..

फ़िर आया गणतंत्र दिवस
इस वर्ष नवल आह्वान करें,
आओ जन जन के मन में
अब राष्ट्र प्रेम का भाव भरें |

आज अहम् को करें किनारे
और स्वयं से बात करे ,
करे देशहित में कुछ चिंतन
करना होगा मन का मंथन |

उनसठ साल अब बीत गए
भारत जबसे गणतंत्र बना,
आओ सोच विचार करे अब
कितना तंत्र, स्वतंत्र बना ?

उन्नति पथ पर हुआ अग्रसर
भारत ने जब आजादी पाई,
कुछ तो अब भी शेष रह गया
आज़ादी पूरी ना मिल पाई |

आओ ख़ुद को देश से जोड़े
देश नही तो हम क्या हैं ?
राष्ट्र प्रेम में जो न समर्पित
फ़िर हम भारतवासी क्या हैं ?

दुःख दरिद्र मिटाए इससे
आतंक के साये का नाश करे,
भ्रष्ट , तंत्र के रखवालों से
अब सत्ता को आजाद करे |

जन जन से ही मिलकर बनता
प्रजातंत्र का ये नारा है ,
तो फ़िर हमने ही क्यों इसको
भूल, देश को दुत्कारा है ?

नए जोश से ओत-प्रोत हो
छब्बीस जनवरी खूब मनाई,
अब खेनी है देश की नौका
जाग युवा, अब बारी आई |

अब पुनः विचार जरूरी है
कुछ नव निर्माण जरूरी है,
जन मानस को आज जगा कर
फूंकना प्राण जरूरी है |

उठो!आज फ़िर इस अवसर पर
पुनः एक संकल्प करें ,
जब तक देश खुशहाल न होवे
तब तक ना विश्राम करें |

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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रविवार, 25 जनवरी 2009

चार लम्हे....

फ़िर नया एक जहाँ,
एक खुशरंग समां,
एक मौसम नया
बनाना चाहता हूँ,
वक्त तुझ से चार लम्हे
फ़िर चुराना चाहता हूँ |

हर शख़्स को खुशी में
मुतरिब बनाना चाहता हूँ,
महफिलों के रंग लबों पे
अब सजाना चाहता हूँ ,

रंज-ओ-गम अब बस !
दोस्ती में सब भुलाना चाहता हूँ,
दूसरे में सबको यहाँ
ख़ुद को दिखाना चाहता हूँ,

बरसों के सूखे दरख्तों को
गुलशन में खिलाना चाहता हूँ ,
जंग में रूठे दिलों को
वस्ल के नुस्खे सिखाना चाहता हूँ ,

देख बन्दों को यहाँ
फ़िर मुस्कुराना चाहता हूँ ,
वक्त तुझसे चार लम्हे
फ़िर चुराना चाहता हूँ |

---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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गुरुवार, 22 जनवरी 2009

इस बार .....

फ़िर एक बार!!!!
जाने कब से
ये आँख मिचोली,
आना फ़िर जाना ,
बस शब भर की
मेहमान नवाजी ?

हर बार बस
आना और फ़िर
सिर्फ़
एक सफहे कि तरह
पलट जाना ,

बन सकता था तू
जिल्द
इस किताब का,
तस्वीर बन
टंग सकता था
मेरी दीवार पर ?

ये तो नहीं
कि मैंने
चाहा नहीं तुझे ,
ये भी नहीं
कि न था
मैं काबिल तेरे,
शायद
मेरी ही बेरुखी थी ,
जाने दिया
तुझे इस तरह |

पर
मंजर अब
बदल गया है,
जो आ गया है
आँख में तू ,
पलक झपकते
भाग नहीं पायेगा |

इस बार, ऐ ख्वाब !
तू जाने नही दिया जाएगा |

------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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रविवार, 18 जनवरी 2009

चल दिये चल दिये...... ..



चल दिये चल दिये
ख्वाब दिल में लिए,
सूखा सागर तो था
फ़िर भी बहते गए |

ख़ुद पे बस था यकीं
राहें सूनी मिली ,
मंजिलों तक सफर
कुछ कठिन ही सही |

कदम खामोश थे
खुश्क थे रास्ते ,
कोई उम्मीद थी
बढ़ चले आसते |

ये भी सोचा नहीं
राह है किस तरफ़,
हर कदम था पता
चाह थी उस तरफ़ |

कहने को बस यही
कुछ तो मिल जाएगा,
सुनते थे बस वही
तू न कुछ पायेगा |

कुछ मिले ना मिले
मज़िलों का पता ,
होगा बस ये गुमाँ
कर दिया, सोचा था |

रुक के 'गर जो कहीं
पीछे देखा कभी ,
होगा गम तो नही
चाहा बस, किया नहीं |.


--------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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अस्तित्व...


समा जाना चाहता हूँ
कहीं,
खो जाना चाहता हूँ
किसी में,
पा लेना चाहता हूँ
कुछ|

फ़िर यकायक
रोम रोम में
उमड़ पड़ता है
एक प्रश्न,
एक ही प्रश्न
बिखर सा पड़ता है,
और अगले ही पल
सामने होती है
एक भीड़,


अनंत विस्तार लिए
वो भीड़
जान पड़ती है
एक फौज
असंख्य सवालो की,
कर देना चाहती है मुझे
बेबस
अपने जवाबो में ,

स्वयं से फ़िर
पूछने लगता हूँ
वही सारे प्रश्न ,
कहाँ जाना है ?
कहाँ खोना है ?
समा जाना है ,
तो किसमें ?

किंतु
जड़ में होता है,
हर प्रश्न की
फ़िर वही एक प्रश्न,
न जाने कब से
कतरा रहा हूँ
जिसके जवाब से,
दौड़ रहा हूँ
उससे दूर ,
फ़िर एक बार
खोजने लगता हूँ
अपना अस्तित्व
स्वयं में ही |

------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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