इस बार .....
फ़िर एक बार!!!!
जाने कब से
ये आँख मिचोली,
आना फ़िर जाना ,
बस शब भर की
मेहमान नवाजी ?
हर बार बस
आना और फ़िर
सिर्फ़
एक सफहे कि तरह
पलट जाना ,
बन सकता था तू
जिल्द
इस किताब का,
तस्वीर बन
टंग सकता था
मेरी दीवार पर ?
ये तो नहीं
कि मैंने
चाहा नहीं तुझे ,
ये भी नहीं
कि न था
मैं काबिल तेरे,
शायद
मेरी ही बेरुखी थी ,
जाने दिया
तुझे इस तरह |
पर
मंजर अब
बदल गया है,
जो आ गया है
आँख में तू ,
पलक झपकते
भाग नहीं पायेगा |
इस बार, ऐ ख्वाब !
तू जाने नही दिया जाएगा |
------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"
3 टिप्पणियाँ:
very nice sirji....gud hai
i think this one deserves a WOW kind of word.Congrats!!!!!!
Wonderfullll dost!!! keep on writing!!!....
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