गुरुवार, 17 जनवरी 2019

Learning from Nature



Tried to make few rhyming lines for my
Son Chirayu to recite in front of his class :


Standing straight n tall
The trees big and green,
Give shelter to the needy
And keep air clean

Little flower in my window
Shows me the way,
I smile all the time
And make your day

Birds chirping in the morning
Wake me up everyday
The melody in my ears
Takes all the blues away |

Lovely breeze from the sea
Where the naughty waves play
Hugs me every morning and
Fills my heart with joy !

I learn from the waves
Rising high n going down
To stand, smile n move
when you fall down !

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सोमवार, 20 नवंबर 2017

आवारगी



ज़माने के रंज-ओ-ग़म से तआ'रुफ़ कराएं चलो
शहर की फ़ज़ाओं में तुम्हें तरबतर कराएं चलो
मुख़्तलिफ़ ज़बानों की मधुर सरगमें सुनाएं चलो
बच्चे ! तुम्हें आवारगी के सबक़ सिखाएं चलो...

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बुधवार, 28 अगस्त 2013

खिलाफत चीख कर करता नहीं हूँ...

पिछले कुछ दिनों से ग़ज़ल के तकनीकी पहलुओं पर ध्यान दे कर ग़ज़ल लेखन का प्रयास कर रहा हूँ । सौभाग्यवश आदरणीय नीरज जी का मार्गदर्शन मिल रहा है । मैं तो शब्दों को जोड़ तोड़ कर बहर में ग़ज़ल कहने का प्रयास बस कर पाया था परन्तु नीरज जी ने ग़ज़ल का रूप दे दिया :


खौफ से बाहर कभी रहता नहीं हूँ  
खोल घर की खिड़कियाँ सोता नहीं हूँ

बात सच मिरची सरीखी बोलकर मैं
महफ़िलों में देर तक टिकता नहीं हूँ

लाख अपना हाथ देते लोग मुझको
चाह कर भी अब यकीं करता नहीं हूँ

दौर कितना भी भले आ जाय मुश्किल 
सामना करने से मैं डरता नहीं हूँ 

चाँद की हसरत भले है दिल में मेरे 
छोड़ कर अपनी जमीं, उड़ता नहीं हूँ
 
लेखनी करती बयाँ अब बात दिल की 
मैं खिलाफत चीख कर करता नहीं हूँ

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गुरुवार, 29 सितंबर 2011

सीमा पार

कितना सुखद है
उस सीमा के पार
जीवन
वहां चिंता है
पर इतनी तो नही
वहां भय है
पर इतना नही
वहां समाज है
पर इससे बहुत ज्यादा
वहां प्रेम है
अपनत्व है
सोहार्द है
यहाँ से कहीं ज्यादा
और स्वार्थ है
यहाँ से बहुत कम

वो सीमा जो
यहाँ से कुछ दूर
कुछ किलोमीटर दूर
खिंच गयी है स्वतः ही
और हम !
निरंकुश होते जा रहे हम
लगे हैं
इस सीमा को बढ़ाने में

लपेट लेंगे सबको
इसी घेरे में
और फिर लूटेंगे
खसोटेंगे
मरेंगे- मारेंगे
बना देंगे अपनी तरह
स्वार्थी
और फिर वो भी
शामिल हो जायेंगे
इसी लूट में
पहले लुटेंगे
फिर लूटेंगे !

जो लूट लेगा
दूसरे को
उसका 'क्लास' होगा
'सोसाइटी' में
जो लुट गया
वो लुटेरा बन जायेगा
उस 'क्लास' का
'क्लास' की नजर में
और हम सब हो जायेंगे
विकसित, 
अंधे विकसित नागरिक ....

----- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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