मंगलवार, 21 जुलाई 2009

आखिरी अलविदा.....

कुछ देर, इक दिन या इक हफ्ता
बस !
यही कह कर गए थे न तुम ?
और ये उम्मीद जगी रह गई
वापसी की.......

शायद मुसलसल मिलती रही माफियाँ
बेफिक्र कर गई मुझको
खौफ ही न रहा, कि कोई
लकीर भी है हमारे दरमियाँ

शायद मैं ही न समझ पाया था
या दोस्ती
या फिर लकीरें
या फिर
भरोसा हो गया था
या तो खुद पर
या आप से जयादा तुम पर
पता नहीं किस पर !

काले बादलों के बीच निकल पड़ता है
चाँद जब, चमचमाते खंजर की तरह,
तुमने भी, कम से कम
इक हाथ निकाल के कह दिया होता
अलविदा !
हाँ !
आखिरी अलविदा ही सही
और काट दिया होता गला इन उम्मीदों का
उस खंजर से,
कि
अब झूठी उमीदों के साथ नहीं जिया जाता मुझसे !!



------------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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गुरुवार, 16 जुलाई 2009

आशियाँ दरख्तों पर बसाने चले हैं....

आशियाँ दरख्तों पर बसाने चले हैं
गुल कोई नया अब खिलाने चले हैं|

कभी कोई आये खयालो में जैसा
फिर समां आज वैसा बनाने चले हैं|

खुदा से ही पूछो कहाँ जायेंगे अब
खुद तो न जाने किस ठिकाने चले हैं|

सबर अब न है ना ही कोई उम्मीदें
आज खुद को ही हम आजमाने चले हैं|

सोचेंगे ना अब अंजाम-ए-सफ़र की
राह में मंजिलों को सजाने चले हैं |

भागते थे जो "निपुण" आप ही से
गीत दिल के वो अब गुनगुनाने चले हैं|

----------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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मंगलवार, 14 जुलाई 2009

मैं अपूर्ण......

बहुत दिनों से ये रिश्ता कुछ ऐसा बन गया है की बस अब कभी भी तुम कुछ न बोलो तो लगता है जैसे कुछ अधूरा सा रह गया |
सोचा आज तुम पर ही कुछ लिखूं या फिर तुम चली आई अपने आप कुछ बन कर ......

बादल उमड़ते हैं,
तुम आती हो
बादल बरसते हैं,
तुम आती हो
हवा की छुन-मुन
या
तूफ़ान की सरसराहट
तुम आ ही जाती हो,

तन्हाई के भीगे पलों में,
रुसवाई के क्षणों में,
याद कोई आये
या मिल जाये,
विरह की वेदना
या मिलन का उन्माद,
सच !
तुम्हें नहीं मतलब इन सब से,
तुम ही हो
सच्ची हमसफ़र शायद,
जो कुछ नहीं मांगती मुझसे
हाँ कभी भी नहीं
बस आ जाती हो,

दिल के भीतर कहीं
छुपी सी रहती हो
हमेशा,
बस कुछ भी हो
आ जाती हो
इठलाती हुई,

कोई भय भी नहीं
तुमको
लोगो का ,
दुनिया का ,
कोई क्या कहेगा?
उँगलियाँ उठेंगी तुम पर?
या महफिले सजेंगी,
तुम ऐसी हो या वैसी हो,

अब शायद
कोई फर्क नहीं पड़ता
मुझे भी
की तुम कैसी हो,
क्या नाम दूं तुमको?
क्या परिभाषा दूं ?
जैसी भी हो
तुम मेरी ही हो
हाँ
तुम मेरी कविता हो |

कभी सोचता हूँ
मैं नहीं लिखता तुमको,
तुम लिख देती हो
मुझे,
मेरे मन को,
इन हलचलों को
आकार देती हो,
वर्ना भटकती फिरती
जो कहीं,
शायद तुम मेरी हो
मैं तुम्हारा
और तुम्हारे बिन
मैं अपूर्ण |

--------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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ज़िन्दगी का सफ़र...

लम्बा तो बहुत ये ज़िन्दगी का सफ़र है
धूप है, छाँव है, ख़ुशी भी हर डगर है|

बैठ के दो पल जो करें इसका सामना
मुस्कुरा के देख यहाँ रंगीन हर सफ़र है|

मौसम हैं कई इस दुनिया में खुदा की
हर हाल में जीना है तू इंसान अगर है |

साकी मेरे पैमाने में कुछ रंग तो भर दे
मैखाना-ए-दिल में जो थोड़ी सी कसर है |

ग़म रोज़ हर एक मोड़ पे मिलते ही रहेंगे
उनमें भी ख़ुशी खोज जो जज्बा-ए-जिग़र है|

क्यों तेरी निगाहों में "निपुण" अश्क़ दफ़न हैं
हंस बोल जरा जिन्द तेरी नूर-ए-नज़र है|


--------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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तरकीब...

कोई तरकीब सोचता हूँ
सूझती ही नहीं
ताने बाने में इस
फिर निकल पड़ता हूँ जब
खोजने खुद को,

शौक है शायद मेरा,
अक्सर उग पड़ता है दिल में
वर्षा में उगने वाली
हरी घास की तरह,
फिर सूख जाता है ,

एक दिन फिर
उग पड़ता है
अनायास ही बिलकुल
जब कभी कोई एक डोर
आ जाती है पकड़ में,

उस डोर को पकड़
भिड़ाने लगता हूँ जुगत
दुसरे छोर तक जाने की,
लेकिन ये मकड़जाल
उलझता ही चला जाता है,
और फिर
फंस जाता हूँ कहीं
फिर सो जाता हूँ कुछ दिन,

शायद इस जाल को
कहते हैं जिंदगी,
और मैं नादान
सुलझाने लगता हूँ इसको,
फिर उलझता हूँ
और फिर उलझता हूँ
और ज्यादा उलझता हूँ
उलझता ही रहता हूँ
और
जीता रहता हूँ ज़िन्दगी ....


------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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रविवार, 5 जुलाई 2009

साँस लेते बुत..

इंसान सब जाने कहाँ खोते गए
साँस लेते बुत से सब बनते गए

ज़िन्दगी के इस सफ़र में मुक्तसर
खोजते थे कुछ, औ' खुद खोते गए |

घर हुआ करते थे वो एक वक़्त था
महल की ख्वाहिश में सब ढहते गए |

घनी आबादियाँ वीरां होती रही
पत्थरो के मकां बस बनते गए |

शहर को किसकी नज़र ये लग गई
बंज़र, हंसीं मंजर सारे होते गए |

था हुजूम-ए-दिलकशी हर चौक पर
अब बेजाँ खिलौने राह में मिलते गए |

हर शब् जो होती थी दिलो में रौनकें
तन्हा ख़लिश उनमें बस भरते गए |

महसूस करते थे "निपुण" अकेले तुम नहीं
सोचते थे सब यहाँ, मगर बहते गए|



---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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शनिवार, 4 जुलाई 2009

कानून में सुधार आया है**

चाहे मानसून लेट आया है
पर एहसास नया ये लाया है,
कानून में सुधार आया है
देश में अब बदलाव आया है|

लड़के को लड़की न खोजनी
ना लड़की को लड़का,
कोई भी मिल जाये चलेगा
बस भिडे प्रेम का टांका |

शायद अब किसी घर में
मूंछों वाली भाभी आएँगी,
कन्यायें कन्या को भी अब
जीजू जीजू बुलाएंगी|

उन्मुक्त गगन के नीचे केवल
अब जोड़े ना रास रचाएंगे,
बदला बदला होगा मंजर
लड़के जब लड़का पटायेंगे|

पुलिस के पास भी अब शायद
छेड़छाड़ के केसेज बढ़ जायेंगे ,
महिला महिला को छेड़ेगी
पुरुष पुरुष से छेड़े जायेंगे |

हर सिक्के के पहलू दो होते
कुछ सुधार तो आयेंगे,
ये नए बदलाव देश को
जनसँख्या विस्फोट से बचायेंगे|


------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

** यह कविता कोई गंभीर विचारधारा को प्रकट नहीं करती | कुछ पहलुओ को हास्य रस में प्रस्तुत किया गया है |

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मिथ्या....

जग जग घूमा नगरी नगरी
माया की ये दुनिया पूरी,
आखिर में मैं खुद से बोला
चल वापस ये शाम घनेरी|

मन तो निश्चल पावन था ये
ना समझा था कुछ कुटिलाई,
मनभावन जो इसे लगा था
उस पथ की थी आस जगाई |

पल पल महकी खुशबू आई
दूर मरीचिका जब इठलाई,
देख उसे तब चंचल मन में
लोलुपता ने ली अंगडाई |

देखा इसने कोनो कोना
सब लगता था कंचन सोना,
पास गया जब तो ये पाया
ठूंठ था सब, था मिथ्या रोना|

रे मन ! अब तू सोच समझ ले
दिखे जो पथ ये सुगढ़ सरल सा,
मुश्किल होगा पार पहुँच के
मिलना, देखा स्वप्न था जिसका ||



------------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

समझ..बौनी हो गई है

अक्सर कुछ ऐसा होता है कि कुछ लिख रहा होता हूँ और मन भटकता हुआ कहीं और चला जाता है और अंत में कुछ और ही बन पड़ता है .... इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ ....

आज
समय के चक्र में
घूमता हुआ
आ चुका हूँ दूर
पर
अब चाहता हूँ लौटना |

लौटना चाहता हूँ ,
फिर से जीना चाहता हूँ ,
वो बचपन
जो छोड़ आया हूँ
कोसों दूर
वो यादें फिर से एक पल
पहुंचा देती हैं वहीँ |

वो ताम्र कलश के
जल सा निर्मल मन,
वो उगते सूर्य की
किरणों सा चंचल हृदय,
सब अपना मान लेता
वो निर्भय मन ,
वो अनूठी अभिलाषा
चाँद को छूने की,
और वो साहस कुछ भी
कर जाने का |

सोचता हूँ
वो निर्भयता थी
या विवेकहीनता
कोई भी ऊँगली पकड़
चल पड़ने का साहस
मुझमें अब तो नहीं ,

समझ बढ़ गई
राग भी बढा,
बैर भी बढा,
और साथ में बढ़ गया
अपने पराये का बोध,
अपना बनाने से कही ज्यादा
बढ़ गया
पराया करने का साहस |

मन , अब भी
अपराधबोध मैं है ,
फिर भी
क्यों नहीं निकल पड़ता
बाहर इस सब से?
क्यों पग पग होते
डगमग ?
कौन सा भय रोक देता है?
कई प्रश्नों का
उत्तर खोज रहा हूँ
शायद
समझ बढ़ी नहीं
बौनी हो गई है |

------------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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गुरुवार, 2 जुलाई 2009

पागल ये मन

पगला ये मन
भटकता ही फिरे
जाने क्या आस है
कोई तो प्यास है
कुछ तलाश है
खोजता ही रहे
चाहे क्या ये पागलSSSSS
पगला ये मन .............

बैठा रहे कहीं
खोया सा गुम कहीं
जाने कुछ भी नहीं
चैन पल भर नहीं
भटके भटके पागलSSSSS
पगला ये मन ..........

चाहे इसको कभी
चाहे उसको कभी
पलके देखे कभी
खवाब झिलमिल सभी
बांवरा होने लगेSSSSS
पगला ये मन ..................

गुनगुन करता रहे
खुद से कहता रहे
देखे खुद को कभी
पूछे खुद से कभी
ताके धरती अम्बरSSSSS
पगला ये मन ..................

दूर कुछ तो दिखे
धुंधला सा वो लगे
मन्ज़िल उसको कहे
रास्ता पर ना दिखे
घूमे नगरी नगरीSSSSS
पगला ये मन
भटकता ही फिरे.................
पगला ये मन .................

------------------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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