मंगलवार, 21 जुलाई 2009

आखिरी अलविदा.....

कुछ देर, इक दिन या इक हफ्ता
बस !
यही कह कर गए थे न तुम ?
और ये उम्मीद जगी रह गई
वापसी की.......

शायद मुसलसल मिलती रही माफियाँ
बेफिक्र कर गई मुझको
खौफ ही न रहा, कि कोई
लकीर भी है हमारे दरमियाँ

शायद मैं ही न समझ पाया था
या दोस्ती
या फिर लकीरें
या फिर
भरोसा हो गया था
या तो खुद पर
या आप से जयादा तुम पर
पता नहीं किस पर !

काले बादलों के बीच निकल पड़ता है
चाँद जब, चमचमाते खंजर की तरह,
तुमने भी, कम से कम
इक हाथ निकाल के कह दिया होता
अलविदा !
हाँ !
आखिरी अलविदा ही सही
और काट दिया होता गला इन उम्मीदों का
उस खंजर से,
कि
अब झूठी उमीदों के साथ नहीं जिया जाता मुझसे !!



------------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

4 टिप्पणियाँ:

moni मंगलवार, 21 जुलाई 2009 को 7:51:00 pm IST  

bahut mushkil halaat hote hain jab ye pal aata hai jindagi main.......aur ye kavita us dard ko vastav main uthati hai...sarahniya prayas hai

Udan Tashtari मंगलवार, 21 जुलाई 2009 को 9:29:00 pm IST  

अब झूठी उमीदों के साथ नहीं जिया जाता मुझसे !!


-क्या बाद है!! बहुत उम्दा तरीके से ज़ज्बातों को व्यक्त किया है! बधाई.

Nidhi मंगलवार, 21 जुलाई 2009 को 11:40:00 pm IST  

Hi,
Nipun,
When some one never says yes or no...means that person wants to play with you. When he/she wants to love you, they do. When they wants to hate you, they do. meanwhile d person who really do love some one, just gets Pain...Pain of Love...

श्रद्धा जैन शनिवार, 25 जुलाई 2009 को 1:54:00 pm IST  

Umeed aur aasha nirasha ke beech jina bahut dukhad hai

sach likha hai ki kaash haath hila kar alvida hi kaha hota

bahut sunder bhaav Nipun

कविता by निपुण पाण्डेय is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License. Based on a work at www.nipunpandey.com. Permissions beyond the scope of this license may be available at www.nipunpandey.com.

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