गुरुवार, 16 जुलाई 2009

आशियाँ दरख्तों पर बसाने चले हैं....

आशियाँ दरख्तों पर बसाने चले हैं
गुल कोई नया अब खिलाने चले हैं|

कभी कोई आये खयालो में जैसा
फिर समां आज वैसा बनाने चले हैं|

खुदा से ही पूछो कहाँ जायेंगे अब
खुद तो न जाने किस ठिकाने चले हैं|

सबर अब न है ना ही कोई उम्मीदें
आज खुद को ही हम आजमाने चले हैं|

सोचेंगे ना अब अंजाम-ए-सफ़र की
राह में मंजिलों को सजाने चले हैं |

भागते थे जो "निपुण" आप ही से
गीत दिल के वो अब गुनगुनाने चले हैं|

----------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

4 टिप्पणियाँ:

mehek गुरुवार, 16 जुलाई 2009 को 11:06:00 pm IST  

सबर अब न है ना ही कोई उम्मीदें
आज खुद को ही हम आजमाने चले हैं|

सोचेंगे ना अब अंजाम-ए-सफ़र की
राह में मंजिलों को सजाने चले हैं |

lajawab sher,bahut sunder badhai

Udan Tashtari गुरुवार, 16 जुलाई 2009 को 11:55:00 pm IST  

सोचेंगे ना अब अंजाम-ए-सफ़र की
राह में मंजिलों को सजाने चले हैं |


-बहुत उम्दा मित्र. छाये हुए हो आप तो!! वाह!

कविता by निपुण पाण्डेय is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License. Based on a work at www.nipunpandey.com. Permissions beyond the scope of this license may be available at www.nipunpandey.com.

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