रविवार, 5 जुलाई 2009

साँस लेते बुत..

इंसान सब जाने कहाँ खोते गए
साँस लेते बुत से सब बनते गए

ज़िन्दगी के इस सफ़र में मुक्तसर
खोजते थे कुछ, औ' खुद खोते गए |

घर हुआ करते थे वो एक वक़्त था
महल की ख्वाहिश में सब ढहते गए |

घनी आबादियाँ वीरां होती रही
पत्थरो के मकां बस बनते गए |

शहर को किसकी नज़र ये लग गई
बंज़र, हंसीं मंजर सारे होते गए |

था हुजूम-ए-दिलकशी हर चौक पर
अब बेजाँ खिलौने राह में मिलते गए |

हर शब् जो होती थी दिलो में रौनकें
तन्हा ख़लिश उनमें बस भरते गए |

महसूस करते थे "निपुण" अकेले तुम नहीं
सोचते थे सब यहाँ, मगर बहते गए|



---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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