रविवार, 25 जनवरी 2009

चार लम्हे....

फ़िर नया एक जहाँ,
एक खुशरंग समां,
एक मौसम नया
बनाना चाहता हूँ,
वक्त तुझ से चार लम्हे
फ़िर चुराना चाहता हूँ |

हर शख़्स को खुशी में
मुतरिब बनाना चाहता हूँ,
महफिलों के रंग लबों पे
अब सजाना चाहता हूँ ,

रंज-ओ-गम अब बस !
दोस्ती में सब भुलाना चाहता हूँ,
दूसरे में सबको यहाँ
ख़ुद को दिखाना चाहता हूँ,

बरसों के सूखे दरख्तों को
गुलशन में खिलाना चाहता हूँ ,
जंग में रूठे दिलों को
वस्ल के नुस्खे सिखाना चाहता हूँ ,

देख बन्दों को यहाँ
फ़िर मुस्कुराना चाहता हूँ ,
वक्त तुझसे चार लम्हे
फ़िर चुराना चाहता हूँ |

---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

3 टिप्पणियाँ:

मोहन वशिष्‍ठ रविवार, 25 जनवरी 2009 को 1:27:00 pm IST  

बरसों के सूखे दरख्तों को
गुलशन में खिलाना चाहता हूँ ,
जंग में रूठे दिलों को
वस्ल के नुस्खे सिखाना चाहता हूँ ,

वाह जी वाह बेहतरीन

आप सभी को 59वें गणतंत्र दिवस की ढेर सारी शुभकामनाएं...

जय हिंद जय भारत

makrand रविवार, 25 जनवरी 2009 को 2:44:00 pm IST  

हर शख़्स को खुशी में
मुतरिब बनाना चाहता हूँ,
महफिलों के रंग लबों पे
अब सजाना चाहता हूँ ,
bahut khub
sunder rachana

Sangeeta मंगलवार, 27 जनवरी 2009 को 11:49:00 am IST  

This one result of a thoughtful mind and immense creativity.

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