शनिवार, 25 अप्रैल 2009

जीवन क्या है...

ग़ज़ल लिखने के मेरे प्रयास का दूसरा कदम....



जीवन क्या है एक ना एक दिन जानना पड़ता है
खोने पाने का हर मौसम सबको काटना पड़ता है |

सुन्दर सुर्ख नहीं हो जाते यूँ ही सारे गुलाब
कोपल छोड़ उन्हें कांटो में खिलना पड़ता है |

वक़्त के दरिया में से बहकर निकले जो
खुशियों और दुखो को उन, अपनाना पड़ता है |

जीवन के इन खेलों में, जीतना चाहे मुमकिन हो,
खुश होकर कुछ मौको पर हार भी जाना पड़ता है |

वक़्त हमें सिखला देता है जीने के सारे अंदाज़
बस सीखों को अपना बना कर गले लगाना पड़ता है |

गर्दिश-ए-दौराँ हर मोड़ पे मिलते हैं "निपुण"
जज्बा-ए-दिल हो गर तो उनको जाना पड़ता है |


-------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

1 टिप्पणियाँ:

srikala रविवार, 26 अप्रैल 2009 को 8:27:00 pm IST  

prayas to kafi aacha hai sir jii keep it up gud going

कविता by निपुण पाण्डेय is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License. Based on a work at www.nipunpandey.com. Permissions beyond the scope of this license may be available at www.nipunpandey.com.

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