बुधवार, 22 अप्रैल 2009

उलझन

आज फिर वही
वही अनसुलझे सवाल
वो पहेलियाँ सी उड़ती हुई
पतंगों की तरह,

जेहन को फिर एक बार
कर देंगी तार तार
फिर होगा वही
शायद वही कुछ

मस्तिष्क जूझता हुआ
अपने तंत्र में
खोजता सा कुछ
भटकता रह जाएगा|

---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

1 टिप्पणियाँ:

परमजीत बाली बुधवार, 22 अप्रैल 2009 को 10:04:00 pm IST  

मनोभावो को सुन्दर शब्द दिए है॥बधाई।

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