शनिवार, 21 नवंबर 2009

अर्थ जीवन का !!!

फिर आ गया हूँ
प्रश्न लेकर अपना पुराना
गतिमान मैं भी ,
जीवन भी मेरा
नए पथ , नूतन बसेरा |
प्रश्न मेरा आज भी है
किस तरफ पग चल पड़े हैं
क्या है अब इसका किनारा ?

मूंदता हूँ नेत्र अपने
खोलता जब पट घनेरे
दंभ भरता हूँ यकायक
मोह में किसके बंधा मैं ?
जान पड़ता अगले ही क्षण
नश्वर ये अभिलाषा है मेरी
क्षणिक बस ये रंग सुनहरे |

फिर नए पदचाप सुन
नए पथ के भ्रम में रत
नयी लय को झट पकड़
पग बढ़ाता एक
और फिर बस !
चल ही पड़ता अनवरत
किस दिशा में, कौन जाने?
छद्म के कोहरे में लेकिन
बूझता तब कोई मुझसे
पूछता या मैं स्वयं से
क्या लक्ष्य का संज्ञान मुझको ?
किस पथ का मैं पथिक |

इन तरंगों का अर्थ क्या
स्वार्थ इनमें लिप्त किसका
मुझमें जो उठती कभी हैं
फिर स्वयं बुझती सभी हैं ?

जीवन ये मेरा पथ अगर
क्या है इसका सच मगर
क्या लक्ष्य इसका 'अर्थ' है ?
इस कामना का अंत कब है ?

जड़ हुए हैं अब ये पग
विराम है, अब है चिंतन |
खोजनी है अब मुझे
परिभाषा अपनी !!
जानना है अब मुझे
अर्थ ,
जीवन का मेरे !!


----------------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

6 टिप्पणियाँ:

शारदा अरोरा शनिवार, 21 नवंबर 2009 को 12:54:00 pm IST  

बड़े ही सुन्दर शब्दों में मन की उहा-पोह को शब्दों में ढाला है , किसी न किसी दिन तो इंसान को ये सोच घेरती ही है कि हमारे होने का मकसद क्या है , और शायद यही सोच हमें जिन्दगी में कुछ मूल्यवान या कहो कि कुछ रचनात्मक करने को विवश करती है | रचना के लिए बधाई , हाँ ....सुनेरी को सुनहरी कर लें |

रश्मि प्रभा... शनिवार, 21 नवंबर 2009 को 2:23:00 pm IST  

शब्दों ख्यालों के ख्वाबगाह जैसा लगा रचना को पढ़ते हुए

Nirmla Kapila शनिवार, 21 नवंबर 2009 को 3:18:00 pm IST  

जान पड़ता अगले ही क्षण
नश्वर ये अभिलाषा है मेरी
क्षणिक बस ये रंग सुनहरे |
बहुत सुन्दर कविता है आप अपूर्ण कहां संपूर्ण हैं जिसने ये यान लिया कि* नश्वर है अभिलाशा मेरी क्षणिक बस ये रंग सुनहरे* वाह लाजवाब बधाई

दिगम्बर नासवा मंगलवार, 24 नवंबर 2009 को 6:32:00 am IST  

जड़ हुए हैं अब ये पग
विराम है, अब है चिंतन |
खोजनी है अब मुझे
परिभाषा अपनी !!
जानना है अब मुझे
अर्थ ,
जीवन का मेरे .....

गहरी और शाश्वत सत्य ......... हर किसी को अपने जीवन के सत्य की तलाश है .......... इसी का नाम जीवन है ....

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