रविवार, 3 मई 2009

ख्वाहिशें

१ . सुनती हैं ,बोलती हैं ,हंसती हैं ,रोती हैं
बेखौफ,बियाबां में,बस भटकती रहती हैं

खाव्हिशें क्यों इतनी अजीब होती हैं ?


२. लोग ख्वाहिशों पे क्यों लगाम नहीं बाँधते
हमेशा से इनकी उडाने लम्बी हुआ करती हैं

चाँद के बाद सूरज पे पहुँच, झुलस पड़ती हैं|

1 टिप्पणियाँ:

अखिलेश शुक्ल रविवार, 3 मई 2009 को 8:56:00 pm IST  

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अखिलेश शुक्ल्
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