मंगलवार, 7 अक्तूबर 2008

एक कशमकश मन में ..............

उलझने ख़ुद यूँ ही
आपस में उलझी हुई सी
बातें हजारो दिल में
ख़ुद से अनकही सी

कुछ सवाल साये में अपने
अपना ही ज़वाब खोजते
कुछ भरम ऐसे भी जो
चाह कर भी न टूटते |

तिशनगी ऐसी रगों में
कुलबुलाती खुदबखुद
खामोशियाँ तो बेजुबां
पर पूछती इनका सबब

कुछ बगावत है कहीं तो
इन सवालो के दरमियाँ भी
कुछ तो अपनी उलझने हैं
कुछ जवाबो की बेबसी भी

आस ऐसी कुछ मचलती
राख भी मानो सुलगती
कुछ हकीक़त ख्वाब अपने
कर गुजरना चाहती

------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

3 टिप्पणियाँ:

safeer शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2008 को 11:44:00 am IST  

uljhane kyo sulajhti nahi hai
jeevan ki dhoop me aashaye jhulasti rahi hai

kyo abr aata nahi hai
dil ki kaliya murjha si rahi hai

meri tippani kaisi lagi zaroor bataye

ritika शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2008 को 11:46:00 am IST  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Nipun शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2008 को 11:49:00 am IST  

अरे इमाम साहब आपने तो कमल कर दिया
इन टिप्पडी को जोड़ के तो कुछ कमाल बन जाएगा सर जी

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