मंगलवार, 7 अक्तूबर 2008

गर मैं पंछी बन जाता....................

काश अगर कुछ यूँ हो जाता
मैं भी पंछी बन जाता
या फ़िर भ्रम के पंख लगा कर
दूर कहीं उड़ जाता

मीलो नाप नाप नभ के मैं
शायद फूला नहीं समाता
खोज कोई सुनसान जगह मैं
एक अपना नीड़ बनाता

इंसानों की इस बस्ती में रह
क्या क्या अनुभव पाए
कुछ खट्टे कुछ मीठे
हर दिन नया दिखाए

ब्रह्म पाश से बंधा हुआ हूँ
जीवन के इस मोह जाल में
अनचाहे भी जुडा हुआ हूँ
मानव की इस भेड़ चाल में

गर मैं पंछी बन जाता
नित नई उडानें भर पाता
देख देख फ़िर इन लोगों को
मन ही मन मुस्काता
'गर मैं पंछी बन जाता

---- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

2 टिप्पणियाँ:

दीपाली शनिवार, 1 नवंबर 2008 को 8:06:00 pm IST  

ब्रह्म पाश से बंधा हुआ हूँ
जीवन के इस मोह जाल में
अनचाहे भी जुडा हुआ हूँ
मानव की इस भेड़ चाल में

आपतो बहुत बढ़िया लिखते है....
अब यकीं कर लीजिये की ये कविताये ही है.....और बहुत अच्छी कविताये...
मुझे ये ऊपर की पंक्तिया बहुत अच्छी लगी.

ishwar singh गुरुवार, 5 मार्च 2009 को 12:11:00 pm IST  

wah!nishabd hu,ki kuchh kahu ya likhu, bas yahi kaamana(FRM D BOTTOM OF HEART/DIL SE)maa sarswati aapake lekhani ko shakti de taaki aap apane hraday k udgaaro ko shabd roop de paaye,aur logo k dard ka ek sahara ban paye,iti ati shukamana/shubh aasheesh .....ishwar
Note..if possible plz send urs RACHANAYE to me....taki rete man ko thoda sa sakoo mil sake.with regards...ishwar

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