मंगलवार, 7 अक्तूबर 2008

मैंने भी देखा है.....................

पता नहीं क्या लिखना चाहता था .......कुछ लिख रहा था पर मुझे समझ नहीं आ रहा था कि क्या विचार आ रहे हैं ................ अंततः कुछ ऐसा बन पड़ा...................


हाँ मैंने भी देखा है
मैंने भी वो सब देखा है
सहिलो से दूर तलक
फैले उस सागर के
अनंत प्रवाह को
देखा है
लोगों को उसका आनंद लेते

संध्या के
उस सिंदूरी आकाश को
फ़िर चाँद को आते
और झिलमिलाते तारो को
मैंने भी देखा है

देखा है वो
सर्दी की रात में
ठिठुरते बच्चो को
सूनी सड़क के किनारे
अगले दिन का इंतज़ार
करती उस माँ को

मैंने देखा है
प्लेटफोर्म पर पड़ी हुई
उस लाश को
जिसकी हड़्डियां
कुछ कहना चाहती हैं
हर आते जाते से

मैंने देखा है
पलकों से बाहर
निकली हुई उन आँखों को
जिनका ख्वाब
बस एक रोटी है
अगली सुबह की

हाँ देखा है
मैंने वो सब
आज भी देख रहा हूँ
पर कब तक देखूँगा

मेरा भी अन्तर
सहमता है उस पल
कचोटता है कुछ
मुझे भी
पर जानता हूँ
केवल सोच लेने से
कुछ नहीं होता

चाहता हूँ मैं भी
अगली किरण ऐसी आए
एक ऐसा तेज़ हो
सब उसमें घुल जाए

वो दिन ऐसा हो
सब साहिल पे खड़े हो सके
शाम की सुन्दरता
सबको शीतल कर सके

सोचता हूँ मैं भी
शायद कुछ करुँ
कुछ कहूं
पर शायद कमजोर हूँ
कहीं कुछ भय है
पर जरूरत कुछ और है

चाहता हूँ कुछ
और लिख सकूं
पर विचार जा चुके हैं
जानता हूँ
लिखने से भी
अब कुछ न होगा
कुछ और है
जो सोचना होगा
जो करना होगा......

----------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

1 टिप्पणियाँ:

sanjeev ror गुरुवार, 9 अक्तूबर 2008 को 10:16:00 am IST  

समझ नहीं आया कि क्या कहना चाहता है ..फिर भी २-३ पंक्तियाँ बहुत ही अच्छी हैं .."पलकों से बाहर....."...बहुत ही सही लिखा है ,अंदरूनी आवाज़ निकली हुई है दोस्त ..

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