शनिवार, 25 अप्रैल 2009

जीवन क्या है...

ग़ज़ल लिखने के मेरे प्रयास का दूसरा कदम....



जीवन क्या है एक ना एक दिन जानना पड़ता है
खोने पाने का हर मौसम सबको काटना पड़ता है |

सुन्दर सुर्ख नहीं हो जाते यूँ ही सारे गुलाब
कोपल छोड़ उन्हें कांटो में खिलना पड़ता है |

वक़्त के दरिया में से बहकर निकले जो
खुशियों और दुखो को उन, अपनाना पड़ता है |

जीवन के इन खेलों में, जीतना चाहे मुमकिन हो,
खुश होकर कुछ मौको पर हार भी जाना पड़ता है |

वक़्त हमें सिखला देता है जीने के सारे अंदाज़
बस सीखों को अपना बना कर गले लगाना पड़ता है |

गर्दिश-ए-दौराँ हर मोड़ पे मिलते हैं "निपुण"
जज्बा-ए-दिल हो गर तो उनको जाना पड़ता है |


-------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

भोर से पहले

आज सुबह तकरीबन चार बजे ही आँख खुल गई | सोचा कुछ लिखूं तो ये कुछ पंक्तियाँ बन पड़ी .......

जग गया हूँ आज मैं सुहानी भोर से पहले
सोचता हूँ इस ख़ुशी में कुछ लिखूं ,
पर भटकता हूँ विचारो की धुन्ध में
बूझता हूँ आप से, लिखूं तो क्या लिखूं ?

पंछियों के प्रात के इस गान को
मधुर कलरव समझ कर मैं लिखूं ?
या निशा के दूर तक फैले हुए
निःशब्द सन्नाटे को लिखूं ?

भानु की चंचल किरण जो अभी आई नहीं
तेज को उसके, नव जोश को लिखूं ?
या गगन में दूर तक पसरे हुए
तिमिर घोर के आक्रोश को मैं लिखूं ?

सोचते ही सोचते नभ लालिमा में रंग गया
रात का अँधा कुआँ चुपचाप जा के सो गया ,
क्षितिज से है झांकती उज्जवल उषा
सोचता हूँ अब इस उजाले पर लिखूं |

इस सुबह मैं कुछ नया ना सोच पाया
पर वही सच बचपन से सुना फिर याद आया,
सब्र रख, बीतेगी निशा और सुबह होगी
चाहता हूँ भोर के उन्माद को अब मैं लिखूं |

----------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

अरमां मेरे ................

आज एक ग़ज़ल लिखने की कोशिश की ......ग़ज़ल के तकनीकी कानून से तो बहुत दूर भटक ही गया हूँगा ...फिर भी कुछ कुछ तुकबंदी सी हो गई है.................

इन दिनों कुछ इस तरह चले जाते हैं,
झूमते गाते ही सब हमें नज़र आते हैं|

राह में चलते हुए शब्-ओ-रोज़ मगर,
अजनबी खुद को, खुद से ही पाते हैं|

खोजते रहते हैं कूचों में कुछ न कुछ,
मीनारें उँगलियों से बनाना चाहते हैं |

तन्हाइयों में गुम, भटकते हैं इस तरह,
नुक्कडों पर मैकदे बस नज़र आते हैं |

रास्ते मिलते हैं चौराहों पे खुद-ब-खुद,
मंजिलों के निशाँ मगर सिमट से जाते हैं|

मंजिलों से आते हैं ख़ामोश हवा के जब झोंके,
"निपुण" अरमां तेरे, फिर मचल से जाते हैं |



-------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

नयी सुबह....

नयी सुबह
किरणों में ओज
अनोखा ,
पलकों में दस्तक
नए नवेले ख्वाबो की,
कदम
लबालब जोश से
दौड़ जाने को बेताब,
पिंजडे से छूटा पंछी
निकल पड़ा हो जैसे
छू लेने बादलो को |

आशाये,
बसंती कोपलों जैसी
लिपटी हुई
नए चोगे में,
थिरक रही हैं
उंगली ले हाथो में
इन ख्वाबो की

मन ये पागल
खडा किनारे
देख रहा है ,
कर बैठेगा
कुछ अगले ही पल ,

बरसों से था
इंतजार में
इसी सुबह के,
शायद पा ले
अब कुछ
अगले ही पल
नई सुबह में ....

-------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

बुधवार, 22 अप्रैल 2009

उलझन

आज फिर वही
वही अनसुलझे सवाल
वो पहेलियाँ सी उड़ती हुई
पतंगों की तरह,

जेहन को फिर एक बार
कर देंगी तार तार
फिर होगा वही
शायद वही कुछ

मस्तिष्क जूझता हुआ
अपने तंत्र में
खोजता सा कुछ
भटकता रह जाएगा|

---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

जिंदगी...

जिंदगी... मैं हूँ ज़िन्दगी
जी ले तू जी ले मुझे थाम कर
कह दे मुझे तू कभी मुख्तसर
पर है ये लम्बा मेरा सफ़र

चाहा जो तूने मुझे
दो पल कभी जान कर
ग़म भी समेटे खड़ी मैं
खुशियो का डेरा भी मेरा सफ़र

रंग अपने हर पल बदलना
मेरी है फ़ितरत मगर ,
सतरंगी बनूँ, झिलमिलाती फिरूं
ख्वाहिश तू कर ले अगर

जब देखूं तारे, नज़ारे
छुपाये से चिलमन तले
गाने लगूं गुनगुनाने लगूं
पास आने को तेरे मचलने लगूं

ख्वाब देखे हैं तूने कई
कोशिश तो कर, कभी पा सकूँ
तेरे दिल को मिले फिर सुकूँ
भूलूं मैं ग़म, मुस्कुराने लगूं

ज़िन्दगी हूँ मैं कुछ इस तरह
पल पल की मैं हूँ रखती खबर
खुशियों को अपनी बस याद रख
ग़म को भुला, कर दे बेअसर

---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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