रविवार, 27 जून 2010

राक्षस कौन ?

रहता था जब
शहर के बीच में
मेरी खिड़की से दिखती थी दूसरी खिड़की
और बालकोनी से दूसरी बालकोनी
घर के नीचे सड़क,
बड़ी बड़ी गाड़ियाँ
और आसमान तक बस
बालकोनी और खिड़कियाँ !

अगर मैं होता धनी
तो देख पाता बस वही,
ये तो मजबूरी ही थी कि
आ गया शहर से दूर

अब मेरी बालकोनी में
तोते भी बैठते हैं कभी , गौरैया भी
कबूतर फुदकते रहते हैं
सामने हरे भरे पेड़ और फूल |

थोड़ी दूर पर पहाड़ हैं
झरने भी फूट पड़ते हैं यहाँ
बारिश में !

कितना खुश हूँ मैं यहाँ !

लेकिन ,
एक पहाड़
अब बचा है आधा ही !
कोई निगल रहा है इसे
कुछ दिन बाद
मुझे यहाँ दिखेगी फिर
बालकोनी अपनी बालकोनी से

और नए घर में रहने वाला
देखेगा
पहाड़ को और पेड़ों को
उस पहाड़ के पार वाले

मैं भी यहाँ हूँ
क्योंकि निगल लिया है
यहाँ पर खड़े पहाड़ को
और मिल गया है ये घर !

सोचता हूँ
राक्षस कौन ?
ये शहर !
जो निगलता जा रहा है सब कुछ
या
आकांक्षा की मजबूरी तले दबा हुआ इंसान
और मैं खुद !

लिख रहा हूँ
क्योंकि आज खुश हूँ
और
दुखी हूँ कल के लिए
लेकिन
दोषी तो मैं ही हूँ
आज और कल के लिए !

---- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

4 टिप्पणियाँ:

वन्दना रविवार, 27 जून 2010 को 11:47:00 am IST  

यथार्थ का चित्रण्……………कल के चर्चा मंच पर आपकी पोस्ट होगी।

हरकीरत ' हीर' सोमवार, 28 जून 2010 को 9:59:00 pm IST  

लिख रहा हूँ
क्योंकि आज खुश हूँ
और
दुखी हूँ कल के लिए
लेकिन
दोषी तो मैं ही हूँ
आज और कल के लिए !

Bahut sunder bhav .....!!

सूर्यकान्त गुप्ता शुक्रवार, 2 जुलाई 2010 को 11:00:00 pm IST  

बढ़ती आबादी रहने को नही है ठौर। विलासिता की चाह ने, गैर इरादों वाली राह ने छीन ली है गरीबों की कौर। प्रकृति विरुद्ध छेड़ दी है लड़ाई। हर जगह देगी बालकनी दिखाई। हम सभी हैं इसके दोषी, आप ही क्यों? रचना है सुन्दर। बधाई।

कविता by निपुण पाण्डेय is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License. Based on a work at www.nipunpandey.com. Permissions beyond the scope of this license may be available at www.nipunpandey.com.

  © Blogger templates The Professional Template by Ourblogtemplates.com 2008

Back to TOP