गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

इन शहरों के भी क्या कहने....

इन शहरों के भी क्या कहने
बस रंग बिरंगे कपडे हैं पहने ....

दिन के उजियारे में जब सूरज तेज दिखाता है
धुंए के मोटे कम्बल को भेद कभी ना पाता है
वो चंचल किरणे जो कहीं ठिठोली करती हैं
बैठ वहीँ, शहरों को अब देख देख वो रोती हैं

इन शहरों के भी क्या कहने
बस रंग बिरंगे कपडे हैं पहने ....

यूँ तो शहर अनोखा और अगणित लोग यहाँ
जाने पहचाने चेहरे पर कोई अपना सा कहाँ
अपनी ही आपाधापी में यूँ सिमट गये सब
खुद से आगे सोच सके जो समय मिले तब

इन शहरों के भी क्या कहने
बस रंग बिरंगे कपडे हैं पहने ....

खामोश निशा जब ढक लेती है पूरे जग को
हर लेती है शहरों की चमक तब उस तम को
चमक बड़ी रंगीं होती, बाहर से बड़ा लुभाती
भीतर इसके घने बादलों की काली छाया होती

इन शहरों के भी क्या कहने
बस रंग बिरंगे कपडे हैं पहने ....

लगे दमकने ये रंगीन रौशनी जब धीरे धीरे
तम के रखवाले तब बिन आहट पैर पसारे
फिर लग जाता है मेला काली करतूतों का
और होने लगता सौदा किन किन चीज़ों का

इन शहरों के भी क्या कहने
बस रंग बिरंगे कपडे हैं पहने .....

------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

5 टिप्पणियाँ:

Surabhi Dwivedi गुरुवार, 29 अप्रैल 2010 को 1:27:00 pm IST  
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Surabhi Dwivedi गुरुवार, 29 अप्रैल 2010 को 1:30:00 pm IST  

Too good!!
Liked the line "जाने पहचाने चेहरे पर कोई अपना सा कहाँ" !!

Keep it up.

संजय भास्कर गुरुवार, 29 अप्रैल 2010 को 4:39:00 pm IST  

बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

Amitraghat गुरुवार, 29 अप्रैल 2010 को 4:41:00 pm IST  

बहुत अच्छे शब्द चुने हैं...."

कविता by निपुण पाण्डेय is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License. Based on a work at www.nipunpandey.com. Permissions beyond the scope of this license may be available at www.nipunpandey.com.

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