अरमां मेरे ................
आज एक ग़ज़ल लिखने की कोशिश की ......ग़ज़ल के तकनीकी कानून से तो बहुत दूर भटक ही गया हूँगा ...फिर भी कुछ कुछ तुकबंदी सी हो गई है.................
इन दिनों कुछ इस तरह चले जाते हैं,
झूमते गाते ही सब हमें नज़र आते हैं|
राह में चलते हुए शब्-ओ-रोज़ मगर,
अजनबी खुद को, खुद से ही पाते हैं|
खोजते रहते हैं कूचों में कुछ न कुछ,
मीनारें उँगलियों से बनाना चाहते हैं |
तन्हाइयों में गुम, भटकते हैं इस तरह,
नुक्कडों पर मैकदे बस नज़र आते हैं |
रास्ते मिलते हैं चौराहों पे खुद-ब-खुद,
मंजिलों के निशाँ मगर सिमट से जाते हैं|
मंजिलों से आते हैं ख़ामोश हवा के जब झोंके,
"निपुण" अरमां तेरे, फिर मचल से जाते हैं |
-------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "