गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

नयी सुबह....

नयी सुबह
किरणों में ओज
अनोखा ,
पलकों में दस्तक
नए नवेले ख्वाबो की,
कदम
लबालब जोश से
दौड़ जाने को बेताब,
पिंजडे से छूटा पंछी
निकल पड़ा हो जैसे
छू लेने बादलो को |

आशाये,
बसंती कोपलों जैसी
लिपटी हुई
नए चोगे में,
थिरक रही हैं
उंगली ले हाथो में
इन ख्वाबो की

मन ये पागल
खडा किनारे
देख रहा है ,
कर बैठेगा
कुछ अगले ही पल ,

बरसों से था
इंतजार में
इसी सुबह के,
शायद पा ले
अब कुछ
अगले ही पल
नई सुबह में ....

-------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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बुधवार, 22 अप्रैल 2009

उलझन

आज फिर वही
वही अनसुलझे सवाल
वो पहेलियाँ सी उड़ती हुई
पतंगों की तरह,

जेहन को फिर एक बार
कर देंगी तार तार
फिर होगा वही
शायद वही कुछ

मस्तिष्क जूझता हुआ
अपने तंत्र में
खोजता सा कुछ
भटकता रह जाएगा|

---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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जिंदगी...

जिंदगी... मैं हूँ ज़िन्दगी
जी ले तू जी ले मुझे थाम कर
कह दे मुझे तू कभी मुख्तसर
पर है ये लम्बा मेरा सफ़र

चाहा जो तूने मुझे
दो पल कभी जान कर
ग़म भी समेटे खड़ी मैं
खुशियो का डेरा भी मेरा सफ़र

रंग अपने हर पल बदलना
मेरी है फ़ितरत मगर ,
सतरंगी बनूँ, झिलमिलाती फिरूं
ख्वाहिश तू कर ले अगर

जब देखूं तारे, नज़ारे
छुपाये से चिलमन तले
गाने लगूं गुनगुनाने लगूं
पास आने को तेरे मचलने लगूं

ख्वाब देखे हैं तूने कई
कोशिश तो कर, कभी पा सकूँ
तेरे दिल को मिले फिर सुकूँ
भूलूं मैं ग़म, मुस्कुराने लगूं

ज़िन्दगी हूँ मैं कुछ इस तरह
पल पल की मैं हूँ रखती खबर
खुशियों को अपनी बस याद रख
ग़म को भुला, कर दे बेअसर

---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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सोमवार, 26 जनवरी 2009

फ़िर आया गणतंत्र दिवस ..

फ़िर आया गणतंत्र दिवस
इस वर्ष नवल आह्वान करें,
आओ जन जन के मन में
अब राष्ट्र प्रेम का भाव भरें |

आज अहम् को करें किनारे
और स्वयं से बात करे ,
करे देशहित में कुछ चिंतन
करना होगा मन का मंथन |

उनसठ साल अब बीत गए
भारत जबसे गणतंत्र बना,
आओ सोच विचार करे अब
कितना तंत्र, स्वतंत्र बना ?

उन्नति पथ पर हुआ अग्रसर
भारत ने जब आजादी पाई,
कुछ तो अब भी शेष रह गया
आज़ादी पूरी ना मिल पाई |

आओ ख़ुद को देश से जोड़े
देश नही तो हम क्या हैं ?
राष्ट्र प्रेम में जो न समर्पित
फ़िर हम भारतवासी क्या हैं ?

दुःख दरिद्र मिटाए इससे
आतंक के साये का नाश करे,
भ्रष्ट , तंत्र के रखवालों से
अब सत्ता को आजाद करे |

जन जन से ही मिलकर बनता
प्रजातंत्र का ये नारा है ,
तो फ़िर हमने ही क्यों इसको
भूल, देश को दुत्कारा है ?

नए जोश से ओत-प्रोत हो
छब्बीस जनवरी खूब मनाई,
अब खेनी है देश की नौका
जाग युवा, अब बारी आई |

अब पुनः विचार जरूरी है
कुछ नव निर्माण जरूरी है,
जन मानस को आज जगा कर
फूंकना प्राण जरूरी है |

उठो!आज फ़िर इस अवसर पर
पुनः एक संकल्प करें ,
जब तक देश खुशहाल न होवे
तब तक ना विश्राम करें |

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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कविता by निपुण पाण्डेय is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License. Based on a work at www.nipunpandey.com. Permissions beyond the scope of this license may be available at www.nipunpandey.com.

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