चार लम्हे....
फ़िर नया एक जहाँ,
एक खुशरंग समां,
एक मौसम नया
बनाना चाहता हूँ,
वक्त तुझ से चार लम्हे
फ़िर चुराना चाहता हूँ |
हर शख़्स को खुशी में
मुतरिब बनाना चाहता हूँ,
महफिलों के रंग लबों पे
अब सजाना चाहता हूँ ,
रंज-ओ-गम अब बस !
दोस्ती में सब भुलाना चाहता हूँ,
दूसरे में सबको यहाँ
ख़ुद को दिखाना चाहता हूँ,
बरसों के सूखे दरख्तों को
गुलशन में खिलाना चाहता हूँ ,
जंग में रूठे दिलों को
वस्ल के नुस्खे सिखाना चाहता हूँ ,
देख बन्दों को यहाँ
फ़िर मुस्कुराना चाहता हूँ ,
वक्त तुझसे चार लम्हे
फ़िर चुराना चाहता हूँ |
---------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

