मंगलवार, 25 जनवरी 2011

आज मनावें गणतंत्र दिवस ...

गणतंत्र दिवस पर शुभकामनाओं और तंत्र को सुन्दर और स्वच्छ बनाने के लिए एक नयी शुरुवात के आवाह्न के साथ ....

आज मनावें गणतंत्र दिवस आओ कुछ सोचा जाय,
ख़ुशी के साथ जरा गुजरे पन्नो को पलटा जाए !
भारत की जो बात करो, भारी गणतंत्र याद आ जाय,
सबसे ज्यादा जनता, इतनी जनता का राज कहाय |

गणतंत्र ये बरसों पुराना, जनता का जब राज भयो ,
ईसा के पहले वैदिक जुग में भी जन को ही तंत्र भयो |
जन औ गण की बात ये कोई नयी ना होती भाई,
अपने वेदों में भी इन तंत्रों की महिमा गयी दिखाय |

आज वक़्त ने पलटी मारी, जनता को दियो सुलाय ,
देख देख जनता खुद कोसे, फिर निंद्रा में जाय समाय |
फिर सर्दी के मौसम में दिवस गणतंत्र ठिठुरता आय ,
हर साल तंत्र की गाथा देखो सिकुड़ी सिकुड़ी जाय |

घोटालों की बाढ़ जो आये जनता देखो बहती जाए ,
एक डाल पर एक घोटाला दूजे पे दूजा लटका पाय |
कोई अपना महल बनाये कोई हवा को कैश कराय,
अनंत तक देखो घोटालों की सुरंग दिए बनवाय|

कोई मंत्री करे है तंतर, मिल कोई खेले जंतर मंतर,
जनता की महिमा बस इतनी, एक तंत्री दियो बिठाय |
ऐसो मायावी गणतंत्र ये कैसो वख्त दियो दिखलाय ,
छिन्न भिन्न सब तंत्र ये कैसो वख्त दियो दिखलाय |

चूहे बिल्ली का सा खेल अजब ये ससुरे दिए बनाय,
एक जाए झंडा फहराने दूजा उ पर अपना रंग चढ़ाय |
आओ जुगत भिडाओ कोई , पहले इनको सफा कराय,
फिर आओ झंडे के नीचे गणतंत्र दिवस मनाया जाय |

------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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शनिवार, 10 जुलाई 2010

सह्याद्रि (मराठी )



चला चला सह्याद्रीच्या कुशी मध्ये,
हि सुंदर डोंगर रांग आणि धबधबे,
ढगांनी झाकलेले ते अभेद्य किल्ले, 
क्षणभर विसावा कधी गुहेमध्ये, 
खरच चला .. चला सह्याद्रीच्या सुंदर कुशी मध्ये..

----------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

हिंदी  अनुवाद : 
चलो चलो सह्याद्रि की गोद में ,
ये सुन्दर पर्वत श्रंखलायें और झरने ,
बादलों में ढके हुए वो अभेद्य किले ,
क्षण भर कभी गुफा में आराम करो ,
चलो ! चलो सह्याद्रि की सुन्दर गोद में !

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गुरुवार, 1 जुलाई 2010

प्रथम किरण सूरज की...

अलसाई सी बैठी थी कब से
डूब गयी थी किस जग में ?
तोड़ निशा के बंध घनेरे
प्रथम किरण जो आई नभ में |

मेघों का भी दंभ ढह चुका
पुलकित हो आह्लाद कर उठा,
सज्जित हो फिर रक्त वर्ण में
नभ सारा ऐसे दमक उठा |

फिर एक अनूठी लहर उठी
वसुधा पल भर में महक उठी ,
हर कण, तन मन जीवन में
स्वर्ण रश्मि हो मुखर उठी |

रह रह कर नव रंगों में ढल
नाच उठे आशाओं के दल ,
मन विस्मृत सा देख रहा बस
क्या होने को है अगले पल |

गहन निशा की एक थपकी से
गुम सुम सी जो ओस बनी थी,
अभिलाषा वो लहक उठी थी
रवि मंडप को निकल पड़ी थी |

कोमल सी ऐसी भानु प्रभा
छू जाती थी जिस भी तन को ,
मानव पंछी तरु पादप सब
उठ पड़ते बस उड़ जाने को |

रोज़ सुबह ऐसे ही आयें
रवि किरणे इठलाती चंचल ,
आलोकित कर जाएँ धरा को
कर जाएँ हर मन को निर्मल |


------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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बुधवार, 30 जून 2010

सवाल....

कभी किसी अँधेरी गुफा में देखा है
कैसे लटके रहते हैं चमगादड़
और
टोर्च से निकलते ही
एक जरा सी रौशनी
उड़ने लगते हैं अचानक
ना जाने क्यों ?
ना कोई मकसद,
ना कोई मंजिल,
बस उड़ते रहते हैं |

बंद होते ही टोर्च
फिर लटक पड़ते हैं
जैसे हैं, जहाँ हैं, वैसे ही !

कभी अकेले बैठा हुआ
उतरता हूँ मैं भी
एक अँधेरे तहखाने में
अपने भीतर |

दिख पड़ते हैं
असंख्य चमगादड़ 'सवालों' के
बेतरतीब लटके हुए,

मुझे देखते ही
उड़ने लगते हैं बेलगाम !

कोई पकड़ लेता है
किसी दूसरे की दुम,
कोई गिराने लगता है
तो कोई
खींचता है दूसरे को
कोई काटने लगता है ,
कुछ लम्बे होने लगते हैं
कुछ गायब भी !

अगले ही पल
एक हलचल होती है
बाहर ,
सब खामोश
लटक पड़ते हैं
मेरे बाहर आते ही |

ना जाने
इन सवालों की भी कैसी आदत है
हमेशा
लटके ही रह जाने की !

-------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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कविता by निपुण पाण्डेय is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License. Based on a work at www.nipunpandey.com. Permissions beyond the scope of this license may be available at www.nipunpandey.com.

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