शनिवार, 6 मार्च 2010

क्यों डरे ....वो किससे डरे !

बहुत दिनों से कुछ ऐसी व्यस्तता हो गयी है कि चाह कर भी ब्लॉग पर आने ...कुछ लिखने ...कुछ पढने का समय ही नही निकाल पा रहा ......इसी बीच कई दिन पहले लिखी कुछ पंक्तियाँ दिख गई ....सोचा ब्लॉग पर पोस्ट कर दूँ....सन्नाटा थोडा लम्बा हो गया अब एक हल्की सी हलचल हो जाये....:)
इस उम्मीद के साथ कि बहुत जल्द फिर से वापस आऊंगा इस तरफ...:)


क्यों डरे ....वो किससे डरे !
मन की उड़ानों को जो भरे !
उमंगों के पर लगा के उड़े
चाहत की झोली भर के चले

क्यों डरे...वो किससे डरे ......
मन की उड़ानों को जो भरे !

अपने ही रस्ते चलना उसे
गम ना कोई वो फ़िक्र करे
सोचे जिधर वो चल दे उधर
बेशुमार जज्बे दिल में लिए !

क्यों डरे...वो किससे डरे ......
मन की उड़ानों को जो भरे !

अपनी ही धुन में चलता रहे
अम्बर तक पहुंचे उसकी उड़ाने
सागर से गहरे गोते लगे ,
हर पल की हंस के कहानी कहे !

क्यों डरे...वो किससे डरे ......
मन की उड़ानों को जो भरे !

------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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बुधवार, 27 जनवरी 2010

हाशिया...!

याद है ना!
एक हाशिया होता था!
इसके उस पार लिखा तो
कट जाते थे नंबर
इम्तेहान में !

एहतियात के लिए
हर कोई
कॉपी मिलते ही ,
हर पन्ने पर
खींच देता था हाशिया !
और फिर शुरू करता था
लिखना |

लेकिन ये तो आदत सी ही पड़ गई !

हाँ !
ज़िन्दगी एक किताब है !
मानता हूँ मैं,
और ये भी
कि जीवन एक इम्तेहान !

मगर,
हाशिया ना हो
ज़िन्दगी में गर !
तो क्या
हो जायेंगे फेल !

क्यों हमेशा खींच देते हैं
हम,
एक हाशिया ज़िन्दगी में !
और जीते रहते हैं
उसके एक तरफ !
सोचते भी नहीं कभी
क्या होगा दूसरी तरफ !

सच बताऊँ !
मैंने तो
छोड़ दिया था
बहुत पहले ही
हाशिया खींचना !
इम्तेहान की कॉपी में|

पर अब
ना जाने क्यों
मजबूर होता हूँ अक्सर, खुद ही
ज़िन्दगी में
खींचने को हाशिया!

नही हो सकती क्या ?
जिन्दगी,
हाशिये के उस पार !

------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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मंगलवार, 26 जनवरी 2010

बिखरे गणतंत्र को बसाना है !

आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !

इस महानतम गणतंत्र को
चलो! पुनः हम आबाद करें !
जो हुई गलतियाँ, सुधारें
छूटे लोगों को अब साथ करें !

क्यों बड़ी बड़ी हम बातें करते ?
डग एक नहीं जब भर सकते !
अंश भर सहयोग हर एक करे,
एक अरब फिर उसमे योग करे |

सर्वोच्च धर्म अपने अन्दर है
भ्रष्ट मन को पहले साफ़ करें
उसके बाद फिर बाहर झांकें
प्रेम का सबसे आगाज़ करें !

आज़ादी कोई छोटा खेल नहीं
गणतंत्र नहीं होता आसान ,
हर एक की जिम्मेदारी होती
जिसको धरती प्यारी होती !

कितने वर्षों का, कितने वीरों का
बलिदान हम व्यर्थ कर रहे
अपने को बाहर करके घर से
स्थिति पर आक्रोश कर रहे !

देश पर कब तक व्यंग करेंगे
भागेंगे अपने ही कर्तव्यों से,
अगर हम नहीं !तो कौन करेगा
व्यवस्था बनती हम सब से !

एक भी अगर छूट गया तो
एक कड़ी गिर गयी तंत्र से ,
हर एक को आगे आना है
जो पाना है कुछ गणतंत्र से !

आओ ! आवाजें कर लें भारी
सुप्त तंत्र को अगर जगाना है ,
हर एक को जोड़ें संग अपने
बिखरे गणतंत्र को बसाना है !

चलो ! स्वयं से शुरुवात करें
अपने मन में एक दीप जलाएं ,
कदम बढ़ाएं छोटा, जो बस में
देश को फिर सुखी समृद्ध बनायें !

----------------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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बुधवार, 20 जनवरी 2010

कहाँ आया बसन्त.......!! किसने देखा ?

सुना है बसन्त ऋतु आई है ! अभी अभी कैलंडर पे नज़र गई तो पता चला ! बसन्त पंचमी की शुभकामनाएं ! :):)




शुभ बसंत ये आया खिल उठी प्रकृति रे !
मुस्काते स्वागत गीत मधुर हर तरु से फूटे
शुभ्र पुष्प दल खिले खिले यूँ लगे महकने,
पल पल हर चंचल कोपल नयी छठा बिखेरे |

पीत वसन में लिपट धरा यूँ लगी सुहानी ,
सरसों झूमे दूर दूर तक, कोयल मधुस्वर छेड़े,
गुनगुनी धूप की प्यारी किरणे झलकी भू पर,
ऋतुराज के स्वागत गीत शीतल पवन संवारे |

ऐसे गीत तेरे स्वागत में, था हर कोई गाता ,
सुनता था मैं भी आता 'बसंत' ,ऐसा छा जाता,
बरसों पहले की यादें, इस बार नहीं मैं गा पाया,
ए शहर ! बता क्या बसंत कोई यहाँ पर आया ?

प्रकृति जो कंक्रीट की हो गई, कैसे अब सँवरेगी ?
प्लास्टिक के सुन्दर फूलों में, खुशबू क्या बिखरेगी?
तरु तो ऊँचे ऊँचे भवन हुए, क्या कोपल निकलेगी ?
बता मुझे ! बस गाने से क्या ऋतू प्यारी निखरेगी ?

रह गये बसंत तुम गीतों में ,बस याद हो आते ,
वन उपवन सौन्दर्य, दिलों में मादकता, झूठी बातें,
नयनों का सुख और मिलन ऋतू रह गई पीछे ,
वैसा ही जीवन यहाँ, बसंत ! तुम आते या जाते |

कैलंडर ये टंगा हुआ बस ! तेरी याद दिला पाता,
चाहता जब तुझे खोजना, गमले में शरमाता पाता |
धीरे धीरे तेरे स्वागत गीत मधुर भूल भी जाऊंगा,
क्या होता था बसंत? फिर ये भी ना बतला पाउँगा |

छुट्टी ले कुछ दिन में, फिर तुमको खोजने आऊंगा ,
दिख जाना जंगल में किसी, अगर बचे रह पाओगे |
वैसे भी अब प्रजातंत्र है ,राजाओ की एक ना चलती है,
इतिहास के पन्नो में ही बस ,'ऋतुराज' कहलाओगे !

---------------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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कविता by निपुण पाण्डेय is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License. Based on a work at www.nipunpandey.com. Permissions beyond the scope of this license may be available at www.nipunpandey.com.

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