बुधवार, 27 जनवरी 2010

हाशिया...!

याद है ना!
एक हाशिया होता था!
इसके उस पार लिखा तो
कट जाते थे नंबर
इम्तेहान में !

एहतियात के लिए
हर कोई
कॉपी मिलते ही ,
हर पन्ने पर
खींच देता था हाशिया !
और फिर शुरू करता था
लिखना |

लेकिन ये तो आदत सी ही पड़ गई !

हाँ !
ज़िन्दगी एक किताब है !
मानता हूँ मैं,
और ये भी
कि जीवन एक इम्तेहान !

मगर,
हाशिया ना हो
ज़िन्दगी में गर !
तो क्या
हो जायेंगे फेल !

क्यों हमेशा खींच देते हैं
हम,
एक हाशिया ज़िन्दगी में !
और जीते रहते हैं
उसके एक तरफ !
सोचते भी नहीं कभी
क्या होगा दूसरी तरफ !

सच बताऊँ !
मैंने तो
छोड़ दिया था
बहुत पहले ही
हाशिया खींचना !
इम्तेहान की कॉपी में|

पर अब
ना जाने क्यों
मजबूर होता हूँ अक्सर, खुद ही
ज़िन्दगी में
खींचने को हाशिया!

नही हो सकती क्या ?
जिन्दगी,
हाशिये के उस पार !

------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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मंगलवार, 26 जनवरी 2010

बिखरे गणतंत्र को बसाना है !

आप सभी को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !

इस महानतम गणतंत्र को
चलो! पुनः हम आबाद करें !
जो हुई गलतियाँ, सुधारें
छूटे लोगों को अब साथ करें !

क्यों बड़ी बड़ी हम बातें करते ?
डग एक नहीं जब भर सकते !
अंश भर सहयोग हर एक करे,
एक अरब फिर उसमे योग करे |

सर्वोच्च धर्म अपने अन्दर है
भ्रष्ट मन को पहले साफ़ करें
उसके बाद फिर बाहर झांकें
प्रेम का सबसे आगाज़ करें !

आज़ादी कोई छोटा खेल नहीं
गणतंत्र नहीं होता आसान ,
हर एक की जिम्मेदारी होती
जिसको धरती प्यारी होती !

कितने वर्षों का, कितने वीरों का
बलिदान हम व्यर्थ कर रहे
अपने को बाहर करके घर से
स्थिति पर आक्रोश कर रहे !

देश पर कब तक व्यंग करेंगे
भागेंगे अपने ही कर्तव्यों से,
अगर हम नहीं !तो कौन करेगा
व्यवस्था बनती हम सब से !

एक भी अगर छूट गया तो
एक कड़ी गिर गयी तंत्र से ,
हर एक को आगे आना है
जो पाना है कुछ गणतंत्र से !

आओ ! आवाजें कर लें भारी
सुप्त तंत्र को अगर जगाना है ,
हर एक को जोड़ें संग अपने
बिखरे गणतंत्र को बसाना है !

चलो ! स्वयं से शुरुवात करें
अपने मन में एक दीप जलाएं ,
कदम बढ़ाएं छोटा, जो बस में
देश को फिर सुखी समृद्ध बनायें !

----------------निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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बुधवार, 20 जनवरी 2010

कहाँ आया बसन्त.......!! किसने देखा ?

सुना है बसन्त ऋतु आई है ! अभी अभी कैलंडर पे नज़र गई तो पता चला ! बसन्त पंचमी की शुभकामनाएं ! :):)




शुभ बसंत ये आया खिल उठी प्रकृति रे !
मुस्काते स्वागत गीत मधुर हर तरु से फूटे
शुभ्र पुष्प दल खिले खिले यूँ लगे महकने,
पल पल हर चंचल कोपल नयी छठा बिखेरे |

पीत वसन में लिपट धरा यूँ लगी सुहानी ,
सरसों झूमे दूर दूर तक, कोयल मधुस्वर छेड़े,
गुनगुनी धूप की प्यारी किरणे झलकी भू पर,
ऋतुराज के स्वागत गीत शीतल पवन संवारे |

ऐसे गीत तेरे स्वागत में, था हर कोई गाता ,
सुनता था मैं भी आता 'बसंत' ,ऐसा छा जाता,
बरसों पहले की यादें, इस बार नहीं मैं गा पाया,
ए शहर ! बता क्या बसंत कोई यहाँ पर आया ?

प्रकृति जो कंक्रीट की हो गई, कैसे अब सँवरेगी ?
प्लास्टिक के सुन्दर फूलों में, खुशबू क्या बिखरेगी?
तरु तो ऊँचे ऊँचे भवन हुए, क्या कोपल निकलेगी ?
बता मुझे ! बस गाने से क्या ऋतू प्यारी निखरेगी ?

रह गये बसंत तुम गीतों में ,बस याद हो आते ,
वन उपवन सौन्दर्य, दिलों में मादकता, झूठी बातें,
नयनों का सुख और मिलन ऋतू रह गई पीछे ,
वैसा ही जीवन यहाँ, बसंत ! तुम आते या जाते |

कैलंडर ये टंगा हुआ बस ! तेरी याद दिला पाता,
चाहता जब तुझे खोजना, गमले में शरमाता पाता |
धीरे धीरे तेरे स्वागत गीत मधुर भूल भी जाऊंगा,
क्या होता था बसंत? फिर ये भी ना बतला पाउँगा |

छुट्टी ले कुछ दिन में, फिर तुमको खोजने आऊंगा ,
दिख जाना जंगल में किसी, अगर बचे रह पाओगे |
वैसे भी अब प्रजातंत्र है ,राजाओ की एक ना चलती है,
इतिहास के पन्नो में ही बस ,'ऋतुराज' कहलाओगे !

---------------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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सोमवार, 18 जनवरी 2010

दौड़........!!

दौड़ है !
दौडाए जा रहे हैं सब !
दौड़ रहा हूँ मैं भी,
अपनी मर्जी से नहीं !
लोग कहते हैं
कौन हैं लोग किसे पता ?
बस दौड़ना है इस तरफ ,
कौन है आगे किसे पता ?
क्यों दौड़ना है किसे पता ?

लेकिन पीछे तो हैं
सब
किसी ना किसी के !
दिखता कहाँ किसी को
अंत बिंदु,
पर
ये भूख कैसी !
खुश कोई नहीं !
फिर किस लिए ?

अगर मैं चाहूँ
रुक के सोचूं , फिर दौडूँ आगे,
नहीं !
नहीं मिलेगा मौका!
बहुत जोर है सबमे ,
धकेलते आये हैं , धकेल ही देंगे !
टूट रहा हूँ कहीं भीतर !

इस असंख्य भीड़ में
कई टूट जाते हैं
रुकने की कोशिश में
गिनती ही कहाँ !
किसी को फर्क नहीं पड़ता !

बाकी बचे
दौड़ते हुए छोड़ देते हैं
दुनिया !
बिना जाने
क्यों दौड़े थे ?
कुछ ही होते हैं,
जो दौड़ पाते हैं
दौड़ अपने मन की !
अपने ट्रेक पर !

क्या हो जायेगा ?
अगर मैं रुक गया !
दिख गया दूसरा रास्ता
अपनी ख़ुशी का मुझे !
लेकिन कोई सोचना ही नहीं चाहता !

ये 'लोग' भी
बड़े अजीब हैं !
पता नहीं कौन हैं ?

पर सब कहते हैं
'लोग' क्या कहेंगे ?
इसलिए
दौड़ो !
सोचो मत,
बस दौड़ो !

------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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कविता by निपुण पाण्डेय is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License. Based on a work at www.nipunpandey.com. Permissions beyond the scope of this license may be available at www.nipunpandey.com.

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