शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

समझ..बौनी हो गई है

अक्सर कुछ ऐसा होता है कि कुछ लिख रहा होता हूँ और मन भटकता हुआ कहीं और चला जाता है और अंत में कुछ और ही बन पड़ता है .... इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ ....

आज
समय के चक्र में
घूमता हुआ
आ चुका हूँ दूर
पर
अब चाहता हूँ लौटना |

लौटना चाहता हूँ ,
फिर से जीना चाहता हूँ ,
वो बचपन
जो छोड़ आया हूँ
कोसों दूर
वो यादें फिर से एक पल
पहुंचा देती हैं वहीँ |

वो ताम्र कलश के
जल सा निर्मल मन,
वो उगते सूर्य की
किरणों सा चंचल हृदय,
सब अपना मान लेता
वो निर्भय मन ,
वो अनूठी अभिलाषा
चाँद को छूने की,
और वो साहस कुछ भी
कर जाने का |

सोचता हूँ
वो निर्भयता थी
या विवेकहीनता
कोई भी ऊँगली पकड़
चल पड़ने का साहस
मुझमें अब तो नहीं ,

समझ बढ़ गई
राग भी बढा,
बैर भी बढा,
और साथ में बढ़ गया
अपने पराये का बोध,
अपना बनाने से कही ज्यादा
बढ़ गया
पराया करने का साहस |

मन , अब भी
अपराधबोध मैं है ,
फिर भी
क्यों नहीं निकल पड़ता
बाहर इस सब से?
क्यों पग पग होते
डगमग ?
कौन सा भय रोक देता है?
कई प्रश्नों का
उत्तर खोज रहा हूँ
शायद
समझ बढ़ी नहीं
बौनी हो गई है |

------------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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गुरुवार, 2 जुलाई 2009

पागल ये मन

पगला ये मन
भटकता ही फिरे
जाने क्या आस है
कोई तो प्यास है
कुछ तलाश है
खोजता ही रहे
चाहे क्या ये पागलSSSSS
पगला ये मन .............

बैठा रहे कहीं
खोया सा गुम कहीं
जाने कुछ भी नहीं
चैन पल भर नहीं
भटके भटके पागलSSSSS
पगला ये मन ..........

चाहे इसको कभी
चाहे उसको कभी
पलके देखे कभी
खवाब झिलमिल सभी
बांवरा होने लगेSSSSS
पगला ये मन ..................

गुनगुन करता रहे
खुद से कहता रहे
देखे खुद को कभी
पूछे खुद से कभी
ताके धरती अम्बरSSSSS
पगला ये मन ..................

दूर कुछ तो दिखे
धुंधला सा वो लगे
मन्ज़िल उसको कहे
रास्ता पर ना दिखे
घूमे नगरी नगरीSSSSS
पगला ये मन
भटकता ही फिरे.................
पगला ये मन .................

------------------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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बुधवार, 24 जून 2009

पहली वर्षा............

पवन एक मदमस्त आई
मेघ को तब याद आई
गगन का अभिमान टूटा
धरा को वरदान जैसा

प्यासी पड़ी कुम्हला गई थी
व्याकुल जमीं ऐसी हुई थी
जब मेघ गर्ज़न कर उठे
फिर विटप पादप खिल उठे

धरा कुछ यूँ मुस्कुराई
अमृतमयी जब फुहार आई
घनन घन घन मेघ गरजे
झिमिर झिम झिम फिर जो बरसे

कुछ इस तरह से जब हुआ
वर्षा का पहला आगमन
वो था बरसता ही गया
मन ये बहकता ही गया

टिप टिप थी हर सू हो रही
हर ओर बूंदे झर रही
नृत्य करता सा मगन था
तृप्त अब हर इक नयन था

मस्त सी जब रुत ये आई
हिय की कली फ़िर खिलखिलाई
मन बाँवरा सा हो रहा
अब झूमता ही जा रहा |

----------------------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण "

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मंगलवार, 23 जून 2009

मुझको ले चल उड़ा..........

आज सुबह तकरीबन ३ बजे खिड़की पे बैठा हुआ था ......भीनी भीनी सी हवा बह रही थी ...कुछ झकझोर गई मन को और बहुत दिनों बाद कुछ पंक्तियाँ बन गई ......



सोंधी सोंधी हवा,
भीनी भीनी हवा,
प्यारी प्यारी सी हौले सुनो
सरगम गाती हवा,

मुझको छूती चले
रेशमी सी लगे
तार मन के हिले
कुछ कहे कुछ सुने
मनचली सी हवा
भीनी भीनी हवा

अम्बर में छाए जब
मेघा काले निराले मेघा ,
यूँ तू बहने लगी
कुछ तू कहने लगी ,
आस मन में मेरे
फिर से जगने लगी ,
और अब ना सता
मुझ को ले चल उड़ा ,
चुलबुली सी हवा
भीनी भीनी हवा ,

नभ में देखो जरा
चाँद है छुप रहा
तारे दिखते नहीं
मेघा बहके से हैं
परदा सब पे किए,
बहकी तू भी लगे
क्या तू गाती चले
गीली गीली हवा
भीनी भीनी हवा

ऐसा भीगा सा
मौसम है आया
राग मन में
उमंगो का छाया
चाहता हूँ उड़ूं ,
मैं भी बहता फिरूं
साथ ले चल मुझे
अपने संग ऐ हवा

बारिशों को लिए
उड़ती आई चली
भीगे तन मन मेरा
बांवरा बन चला,
ख्वाब सोये हुए
अब हैं जगने लगे ,
अरमा दिल के मेरे
क्यों मचलने लगे ,

महका सा है समां
गाती है हर फ़िज़ा
अब सबर न रहा
मुझको ले चल हवा,
भीनी भीनी हवा
गुनगुनाती हवा
मुझको ले चल उड़ा |

--------------- निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

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कविता by निपुण पाण्डेय is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License. Based on a work at www.nipunpandey.com. Permissions beyond the scope of this license may be available at www.nipunpandey.com.

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