शनिवार, 4 जुलाई 2009

कानून में सुधार आया है**

चाहे मानसून लेट आया है
पर एहसास नया ये लाया है,
कानून में सुधार आया है
देश में अब बदलाव आया है|

लड़के को लड़की न खोजनी
ना लड़की को लड़का,
कोई भी मिल जाये चलेगा
बस भिडे प्रेम का टांका |

शायद अब किसी घर में
मूंछों वाली भाभी आएँगी,
कन्यायें कन्या को भी अब
जीजू जीजू बुलाएंगी|

उन्मुक्त गगन के नीचे केवल
अब जोड़े ना रास रचाएंगे,
बदला बदला होगा मंजर
लड़के जब लड़का पटायेंगे|

पुलिस के पास भी अब शायद
छेड़छाड़ के केसेज बढ़ जायेंगे ,
महिला महिला को छेड़ेगी
पुरुष पुरुष से छेड़े जायेंगे |

हर सिक्के के पहलू दो होते
कुछ सुधार तो आयेंगे,
ये नए बदलाव देश को
जनसँख्या विस्फोट से बचायेंगे|


------------ निपुण पाण्डेय "अपूर्ण"

** यह कविता कोई गंभीर विचारधारा को प्रकट नहीं करती | कुछ पहलुओ को हास्य रस में प्रस्तुत किया गया है |

9 टिप्पणियाँ:

vishalmagar रविवार, 5 जुलाई 2009 को 9:12:00 pm IST  

ultimate man... :) :) :)

delhi hc ne apna verdict kya diya, aapne usspe hi kavita likh daali...
sahi hai... carry on

mayank_madhav सोमवार, 6 जुलाई 2009 को 10:32:00 am IST  

Nice you diversifying to Hasya kavita.... serious wali kafi serious ho jati hai...
Topic is unique,kahi bhi publish ho jayegi,tum bhejte hi nahi,and everyone can enjoy it....
Unique poem topic and very well structured
flow..har para alag hai

Amateur सोमवार, 6 जुलाई 2009 को 10:35:00 am IST  

वह अति उत्तम कविता कि है आपने|
पढ़के मजा आ गया|
धन्यवाद!

Sangeeta सोमवार, 6 जुलाई 2009 को 4:09:00 pm IST  

kya baat hai....bahut accha likha hai...hansi hansi main itne serious topic ko is tarah se lia ke bus padhne main majja aa gaya

Omkar मंगलवार, 7 जुलाई 2009 को 12:35:00 pm IST  

Kya sahi likha hai........sansar ka naya roop hasi hasi mai sabke samane laya hai.............yaar pahale hi hum jaise ladako ko ladkiya nahi milati...aab to is competition mai ladkiya bhi aayegi.... :)

ajay शुक्रवार, 10 जुलाई 2009 को 2:26:00 pm IST  
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
Sangeeta शुक्रवार, 10 जुलाई 2009 को 2:40:00 pm IST  

kamaal ho gaya buddy...is baat per khush hoie ya soch vichar kare ke teri yeh kavita puri duniya per chaa gai hai...itne mails forward ho re hai is poem ke per without ur name...kahi tere naam ka jikra bhi nai hai.....

कविता by निपुण पाण्डेय is licensed under a Creative Commons Attribution-Noncommercial-No Derivative Works 2.5 India License. Based on a work at www.nipunpandey.com. Permissions beyond the scope of this license may be available at www.nipunpandey.com.

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